कागजी संरक्षण की खुली पोल: रेत माफिया के चंगुल में कराह रहे मध्य प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय रामसर स्थल
Updated: 6 days ago
आदिल खान (भोपाल):मध्य प्रदेश सरकार वैश्विक मंचों पर अपने पांच अंतरराष्ट्रीय रामसर स्थलों की पर्यावरण सूची को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है, लेकिन जमीनी और अदालती हकीकत इसके ठीक उलट एक भयानक तस्वीर बयां करती है। अंतरराष्ट्रीय महत्व की इन आर्द्रभूमियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए 'वेटलैंड्स नियम 2017' प्रशासन की नाक के नीचे दम तोड़ रहे हैं, क्योंकि राज्य की जीवनदायिनी नदियों और इन संरक्षित जल निकायों का सीना अवैध रेत उत्खनन के जरिए बेखौफ छलनी किया जा रहा है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने 22 जुलाई 2026 और इसके बाद 6 अक्टूबर 2026 को देशव्यापी जांच के विस्तार व 12 अक्टूबर 2026 को वेटलैंड्स के ग्राउंड-ट्रूथिंग से जुड़े आदेशों में राज्य सरकार को सख्त फटकार लगाते हुए कहा है कि सरकार अपनी कमियों का सहारा लेकर लाचारी नहीं जता सकती। वहीं, अक्टूबर 2026 में सामने आई राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानि NGT की संयुक्त समिति की हालिया जांच रिपोर्ट ने इन दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, भिंड और दतिया जिलों में 11 अलग-अलग स्थानों पर लगभग 6,010 घन मीटर अवैध रेत का स्टॉक पाया गया है। रिपोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि कागजों पर 'अमृत धरोहर' और 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाले सरकारी तंत्र की टास्क फोर्स जमीन पर पूरी तरह निष्प्रभावी है और स्थानीय अधिकारियों व खनन माफियाओं के बीच गहरी साठगांठ की आशंका है। इन संवेदनशील इको-सिस्टम को माफियाओं के चंगुल से बचाने की न तो प्रशासनिक व्यवस्था में कोई ठोस इच्छाशक्ति दिखती है और न ही मुकम्मल प्रशासनिक तैयारी।

मध्य प्रदेश के सबसे गौरवशाली अंतरराष्ट्रीय वेटलैंड्स में शुमार भोपाल का भोज वेटलैंड (अपर और लोअर लेक) इस समय सबसे गंभीर नीतिगत संकट से गुजर रहा है। पर्यावरण संरक्षण संस्था Sandrp (South Asia Network on Dams, Rivers and People) की ताजा अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, इस संवेदनशील रामसर स्थल के कैचमेंट एरिया, जलीय क्षेत्र और नजदीकी वन भूमि को एक विवादित सड़क परियोजना और उसके इर्द-गिर्द धड़ल्ले से चल रहे अवैध मुरम व रेत उत्खनन से सीधा खतरा पैदा हो गया है। अंतरराष्ट्रीय नियमों (Ramsar Rules) के तहत इस पूरे तालाब क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण और व्यावसायिक खनन पर पूर्ण प्रतिबंध है, लेकिन स्थानीय भू-माफिया और राजनीतिक रसूखदारों के दबाव में इस शहरी फेफड़े की सीमाओं को लगातार सिकोड़ा जा रहा है, जिससे तालाब का प्राकृतिक जलभृत और पक्षियों का आवास पूरी तरह संकट में है।
Madhya Pradeshs International, Ramsar Sites Suffer Under, the Grip of the Sand Mafia
मालवा क्षेत्र की जीवन रेखा माने जाने वाले इंदौर के यशवंत सागर और सिरपुर वेटलैंड
की कहानी भी इससे अलग नहीं है। India Sand Watch (Veditum) के एक विस्तृत नीतिगत खुलासे के मुताबिक, इन वेटलैंड्स को पानी की आपूर्ति करने वाली गंभीर और खान नदियों के सहायक नालों व तटीय इलाकों में भारी पोकलैंड मशीनों से रात के अंधेरे में रेत निकाली जा रही है। इस बेलगाम उत्खनन के कारण इन जलाशयों की प्राकृतिक जलीय संरचना बदल रही है और नदियों में गहरे जानलेवा गड्ढे बन गए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस अंधाधुंध रेत चोरी के कारण इस क्षेत्र में भारत के राजकीय पक्षी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील 'सारस क्रेन' (Sarus Crane) के पारंपरिक अंडजनन (nesting) और भोजन तलाशने वाले प्राकृतिक दलदली मैदान पूरी तरह नष्ट हो रहे हैं। मछुआरों और स्थानीय पर्यावरणविदों के अनुसार, जो क्रेन और बगुले कुछ साल पहले तक यहां हजारों की संख्या में दिखते थे, वे अब इस शोर और बर्बादी के कारण यहां से पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।

इस प्रशासनिक नाकामी का सबसे भयावह रूप होशंगाबाद (नर्मदापुरम) में स्थित तवा जलाशय और उससे जुड़ी नर्मदा नदी की सहायक प्रणालियों में देखने को मिल रहा है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की सीमाओं को छूने वाले इस संवेदनशील रामसर स्थल के ठीक बगल से गुजरने वाली नर्मदा और तवा की धाराओं में एनजीटी के नियमों को ताक पर रखकर पनडुब्बियों और लिफ्टरों के जरिए रेत निकाली जा रही है। Veditum Environmental Research की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार के वर्ष 2019 के रेत नियम इतने खोखले हैं कि वे केवल पुलों और जल योजनाओं जैसी बुनियादी संरचनाओं के आसपास तो माइनिंग ज़ोन प्रतिबंधित करते हैं, लेकिन इन अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता हॉटस्पॉट और वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित रखने के लिए उनमें कोई विशेष कानूनी सुरक्षा कवच शामिल ही नहीं है। नतीजा यह है कि इस बेखौफ माइनिंग से नर्मदा की पहचान मानी जाने वाली 'महाशीर मछली' और कमानकर व घोगरा जैसी स्थानीय दुर्लभ मछलियों की प्रजातियां अब विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी हैं। (तवा जलाशय के अवैध उत्खनन को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर माफिया सक्रिय हैं। जो बिना मीनिंग स्वीकरती के अवैध रूप से टाइगर रिसर्व एवं रामसर स्थल को निशाना बना रहे हैं)

अदालती दस्तावेजों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच ने हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष 'टास्क फोर्स' की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से एक 'दिखावा' करार देकर खारिज कर दिया है। The Indian Express की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, एनजीटी की जांच समिति ने पाया कि यह तथाकथित सरकारी टास्क फोर्स बड़े और रसूखदार खनन माफियाओं के सिंडिकेट को छूने से भी डरती है। यह दस्ता केवल छोटे-मोटे गरीब मजदूरों या लावारिस पड़े रेत के ढेरों पर दिखावे की जब्ती करके अपनी फाइलें भर लेता है। इसके अलावा, ट्रिब्यूनल ने साफ तौर पर चेताया है कि जिला खनिज अधिकारियों और स्थानीय पुलिस थानों की माफियाओं के साथ गहरी प्रशासनिक मिलीभगत है, जिसके कारण प्रतिबंधित और इको-सेंसिटिव रामसर क्षेत्रों में भी बिना रॉयल्टी और बिना नंबर प्लेट के सैकड़ों डंपर खुलेआम दौड़ रहे हैं।
इस पूरे अवैध साम्राज्य को खाद-पानी देने का काम राज्य सरकार की वो नीतिगत लापरवाही कर रही है, जिसके तहत प्रदेश के 55 में से 47 खनन प्रभावित जिलों में अनिवार्य 'जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट' या तो बनाई ही नहीं गई है या फिर वो जानबूझकर बेहद पुरानी, अस्पष्ट और अपूर्ण रखी गई है। Ground Report India की पड़ताल बताती है कि इन सरकारी रिपोर्टों में जानबूझकर जीपीएस कोऑर्डिनेट्स और खनन की ऊपरी सीमाओं को छिपाया जाता है ताकि माफिया वैध पट्टों की आड़ में इन अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट्स की नदियों का सीना बेखौफ चीर सकें। अंततः, जब तक सरकार अपनी इस प्रशासनिक सांठगांठ को नहीं तोड़ती और सुप्रीम कोर्ट के हालिया सख्त निर्देशों के अनुसार इन खनन माफियाओं के वित्तीय साम्राज्य की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) से करवाकर स्थानीय कलेक्टरों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं करती, तब तक मध्य प्रदेश के ये विश्वप्रसिद्ध रामसर स्थल केवल कागजी विज्ञापनों में ही सुरक्षित बचे रहेंगे।


















