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चुनाव आयोग का आंतरिक विवाद और मुख्य चुनाव आयुक्त: एक विस्तृत रिपोर्ट! The Election Commissions, Internal Dispute and, the Chief Election Commissioner

6 days ago
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संपादकीय टिप्पणी(मनोज सिंह कुसवाह): हाल ही में सामने आए चुनाव आयोग के आंतरिक दस्तावेजों ने देश के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके साथी आयुक्तों के बीच के मतभेदों ने संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रस्तुत है इस पूरे विवाद का एक विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण।

The Election Commissions, Internal Dispute and, the Chief Election Commissioner

वर्तमान विवाद के केंद्र में मौजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर अत्यंत प्रभावशाली और संवेदनशील पदों से जुड़ा रहा है। उनका जन्म 27 जनवरी 1964 को उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एनवायरनमेंटल इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की है। साल 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी रहे ज्ञानेश कुमार देश के सबसे ताकतवर नौकरशाहों में गिने जाते रहे हैं। जब देश में दो सबसे बड़े और संवेदनशील फैसले लिए गए, तब वह गृह मंत्रालय में जम्मू-कश्मीर और अयोध्या डेस्क के संयुक्त और अतिरिक्त सचिव थे। साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने और राज्य के पुनर्गठन का ड्राफ्ट तैयार करने में उनकी मुख्य भूमिका थी। इतना ही नहीं, अयोध्या में 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के गठन के कानूनी दस्तावेज तैयार करने का जिम्मा भी उन्हीं के पास था। इसके बाद वह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अधीन नवगठित 'सहकारिता मंत्रालय' के सचिव बने। इकतीस जनवरी 2024 को सेवानिवृत्ति के बाद, 15 मार्च 2024 को उन्हें चुनाव आयुक्त और 19 फरवरी 2025 को भारत का 26वां मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया।


इस पूरे प्रशासनिक इतिहास के बीच वर्तमान विवाद तब सामने आया जब 'द इंडियन एक्सप्रेस' की पड़ताल के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार के ही दो साथी कमिश्नरों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार लिखित रूप से कड़ा विरोध दर्ज कराया। ये आपत्तियां कोई सामान्य मतभेद नहीं बल्कि लोकतंत्र के बुनियादी नियमों के उल्लंघन के सीधे आरोप थे। सबसे गंभीर आपत्ति स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर को लेकर थी, जिसके तहत देश की मतदाता सूची से लगभग 13 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं। साथी आयुक्तों का आरोप था कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने या नए नाम जोड़ने के फैसले को मुख्य चुनाव आयुक्त ने एकतरफा तरीके से लागू किया, जिसकी जानकारी उन्हें बैठक से पहले नहीं दी गई थी। इसके अलावा, साथी कमिश्नरों ने 'ईसीआईनेट' सॉफ्टवेयर के एकाधिकार और वोटरों के संवेदनशील डेटाबेस की कस्टडी व सुरक्षा को लेकर भी लिखित आपत्ति जताई। उनका आरोप था कि इस सॉफ्टवेयर के जरिए लिए जाने वाले तकनीकी फैसलों में पूरी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। चुनाव कानूनों के तहत अगर किसी वोटर का नाम गलत हटता है, तो उसकी बहाली के खिलाफ अपील करने की जो कानूनी प्रक्रिया होती है, उसमें भी बिना फुल-कमीशन की मंजूरी के डिप्टी इलेक्शन कमिश्नरों के जरिए सीधे आदेश जारी करवाने के आरोप लगे हैं। The Election Commissions, Internal Dispute and, the Chief Election Commissioner

इस आंतरिक विवाद की आग अभी सुलग ही रही थी कि इसमें एक नया और बेहद विस्फोटक मोड़ केरल के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉम्पसन के खुलासे से आ गया। थॉम्पसन का दावा है कि साल 2016 में जब ज्ञानेश कुमार दिल्ली में केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर थे, तब उन्होंने उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में केरल की पत्तनमथिट्टा सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था। थॉम्पसन के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार ने उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाने तक का प्रलोभन दिया था, हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और ज्ञानेश कुमार के दफ्तर से इस पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस खुलासे के बाद राजनीति में भारी उबाल आ गया है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीधे शब्दों में मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधते हुए लोकतंत्र को संस्थागत रूप से खत्म करने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ बीजेपी ने इस नैरेटिव को खारिज करते हुए कहा है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में मतभेद होना किसी जीवंत लोकतंत्र की निशानी है। खुद चुनाव आयोग ने भी आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि चर्चा के दौरान अलग-अलग राय आना सामान्य प्रक्रिया है और अंततः सभी फैसले सर्वसम्मति से ही पास हुए थे, जबकि एनडीए के कुछ अंदरूनी सहयोगियों ने भी आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर जोर दिया है।

अब यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका है, जहां मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें मांग की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से तब तक निलंबित किया जाए जब तक कि 14 विवादित फैसलों की स्वतंत्र न्यायिक जांच पूरी नहीं हो जाती। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर शुरुआती स्तर पर सीधे निलंबन से इनकार कर दिया है, लेकिन चुनाव आयोग जैसी सर्वोच्च संस्था पर उठे इन सवालों ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे में एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

निष्कर्ष: चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था पर देश के करोड़ों नागरिकों का भरोसा टिका है। ऐसे में आंतरिक दस्तावेजों का लीक होना, शीर्ष अधिकारियों के बीच मतभेद और गंभीर प्रशासनिक आरोप लोकतंत्र की सेहत के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। यह समय यह सुनिश्चित करने का है कि संस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर किसी भी प्रकार का संदेह न रहे।

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