क्या श्रीराम के नाम पर हुआ था मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण का खेल? ₹100 करोड़ खर्च, सच क्या है!
(संपादकीय) राजकमल गुप्ता : मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का मुद्दा केवल कानूनी उलझन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने सूबे की राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने एक तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए मुख्यमंत्री मोहन यादव और बीजेपी सरकार पर सीधा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में 27% आरक्षण का प्रभावी पक्ष रखने के नाम पर देश के महंगे वकीलों पर जनता के टैक्स के 100 करोड़ रुपये से ज्यादा पानी की तरह बहा दिए, लेकिन इसके बावजूद जानबूझकर मामले को ऐसा कमजोर रखा कि यह अदालत में टिक न सके।

इन तीखे सियासी बयानों और आरोपों के बीच, जब हम विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड्स, वकीलों की फीस के गणित और इस आरक्षण व्यवस्था की अंदरूनी सच्चाइयों का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो कई परतें खुलकर सामने आती हैं। कांग्रेस ने विधानसभा में विधायक सुनील उइके के एक सवाल के लिखित जवाब और सरकारी दस्तावेजों का हवाला देते हुए बड़ा दावा किया है। इसके मुताबिक, इस कानूनी लड़ाई के लिए देश के शीर्ष वकीलों की फौज उतारी गई थी और पिछले कुछ वर्षों में अदालत में इस मामले की लगभग 110 से 120 बार पेशियां या तारीखें लगीं।
संसदीय और कानूनी गलियारों में चर्चा है कि देश के सॉलिसिटर जनरल और शीर्ष वरिष्ठ वकीलों की प्रति सुनवाई की फीस 25 लाख से 35 लाख रुपये तक होती है। कांग्रेस का आरोप है कि चाहे कोर्ट में लंबी बहस हुई हो या सिर्फ तारीख आगे बढ़ी हो, सरकारी खजाने से यह भुगतान लगातार होता रहा, जिससे कुल खर्च 100 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। विपक्ष का मूल सवाल यह है कि यदि सरकार आरक्षण के पक्ष में लड़ने के लिए इतनी भारी-भरकम राशि खर्च कर रही थी, तो वह कोर्ट में पुख्ता 'क्वांटिफिएबल डेटा' यानी वैज्ञानिक और ठोस आंकड़े पेश करने में क्यों नाकाम रही?
27% OBC reservation scheme, in Madhya Pradesh orchestrated, in the name of Lord Ram
इस पूरे विवाद का एक सबसे संवेदनशील और अनकहा पहलू ओबीसी आरक्षण के भीतर धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति और उसका मूल ओबीसी जातियों पर पड़ने वाला प्रभाव है। 2011 की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 6.57% और ईसाई आबादी करीब 0.29% है। मंडल आयोग और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के तहत, इन समुदायों की कई सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों (पसमांदा मुस्लिम और पिछड़ा ईसाई) को राज्य की ओबीसी सूची में शामिल किया गया है, जिनकी संख्या 30 से अधिक है।
भारत में 0BC आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है। चूंकि ओबीसी को मिलने वाले कोटे के भीतर अलग से कोई उप-वर्गीकरण नहीं है, इसलिए ये अल्पसंख्यक जातियां भी उसी साझा 14% पूल का हिस्सा बनती हैं। जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में ये जातियां सीधे तौर पर यादव, कुर्मी, लोधी, साहू और कुशवाहा जैसी मूल हिंदू ओबीसी जातियों के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं। सीमित कोटे के कारण इन गैर-हिंदू जातियों के चयन से मूल पिछड़ों के हिस्से आने वाली सीटें आनुपातिक रूप से कम हो जाती हैं, जिसे लेकर कई हिंदू ओबीसी संगठन लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं।
इस कानूनी प्रक्रिया के दौरान सोशल मीडिया पर एक और बड़ा नैरेटिव वायरल हुआ कि 'मोहन यादव सरकार ने कोर्ट में भगवान राम को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं।' जब इस दावे की तहकीकात की गई, तो इसकी पूरी सच्चाई सामने आई। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने अदालत में ऐसा कोई हलफनामा या बयान नहीं दिया था। वास्तव में, इस बड़े कानूनी मामले में सरकार के अलावा कई निजी ओबीसी संगठन (जैसे ओबीसी महासभा) भी पक्षकार थे।
इन निजी संगठनों की पैरवी के लिए दक्षिण भारत से आए एक वरिष्ठ वकील ने अदालत में सामाजिक पिछड़ेपन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को साबित करने के लिए प्राचीन ग्रंथों के कुछ संदर्भों का हवाला दिया था। राजनीतिक स्वार्थ के चलते इन निजी वकीलों के तर्कों को राज्य सरकार का आधिकारिक बयान बताकर सोशल मीडिया पर दुष्प्रचारित कर दिया गया, जो तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह निराधार था। इसके अलावा, नीतिगत स्तर पर यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या केंद्र सरकार की तर्ज पर मध्य प्रदेश में सीधे 27% ओबीसी आरक्षण नहीं दिया जा सकता था?
इसका जवाब भारतीय संविधान के अनुच्छेदों और सुप्रीम कोर्ट की तय सीमाओं में निहित है। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत अनुसूचित जनजाति (ST) और अनुसूचित जाति (SC) को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देना अनिवार्य है। मध्य प्रदेश एक आदिवासी और अनुसूचित जाति बहुल राज्य है, जहाँ 2011 की जनगणना के अनुसार ST की आबादी लगभग 20% और SC की करीब 16% है, जिसे कोई भी सरकार कम नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी केस (1992) के कड़े निर्देशों के मुताबिक कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता। यहाँ गणित यह है कि 20% (ST) + 16% (SC) मिलकर पहले ही 36% हो जाते हैं, जिससे 50% की सीमा के भीतर ओबीसी के लिए केवल 14% की जगह बचती है। केंद्र स्तर पर ST/SC की आबादी कम होने के कारण वहां कुल कोटा 22.5% होता है, जिससे 27% ओबीसी कोटा भी समाहित हो जाता है। लेकिन मध्य प्रदेश की डेमोग्राफी अलग होने के कारण यह फार्मूला यहां सीधे लागू नहीं हो पाता।
हाई कोर्ट ने अपने 159 पन्नों के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने बिना किसी ठोस वैज्ञानिक डेटा के चुनावी लाभ के लिए इसे बढ़ाकर 63% कर दिया था। अदालत के अनुसार, मराठा आरक्षण केस के नियमों के तहत 50% की सीमा पार करने के लिए "असाधारण परिस्थितियां" साबित करनी होती हैं, जिसे वर्तमान सरकार भी वकीलों की फौज खड़े करने के बावजूद साबित नहीं कर पाई।
अंततः यह पूरा मामला अब कानूनी लड़ाई से ज्यादा राजनीतिक फुटबॉल बन चुका है। कांग्रेस का 2019 का बिना पुख्ता डेटा का दांव हो या बीजेपी सरकार का 100 करोड़ खर्च करने के बाद भी अदालत में कमजोर साबित होना—दोनों ही राजनीतिक दल कटघरे में खड़े नजर आते हैं। इन सबके बीच सबसे बड़ा नुकसान पिछले कई वर्षों से उस आम युवा का हो रहा है, जिसकी सरकारी नौकरियां और नियुक्तियां '87-13' के फॉर्मूले के अनिश्चित चक्रव्यूह में उलझकर रह गई हैं।

















