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कर्नाटक की अंतिम मतदाता सूची में 1 करोड़ नामों की भारी कटौती, चुनावी पुनरीक्षण प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल!

6 days ago
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Editorial:कर्नाटक में पिछले करीब चार महीने से चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर प्रक्रिया के समापन के बाद मंगलवार को राज्य की अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई है, जिसमें मतदाताओं की संख्या में अप्रत्याशित और ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस नई और अंतिम सूची में कुल 4,54,55,689 (4.55 करोड़) मतदाताओं के नाम दर्ज हैं, जो कि गणना फॉर्म बांटने की प्रक्रिया शुरू होने से कुछ दिन पहले की मतदाता संख्या से बेहद कम है। पूर्व में राज्य में 5,54,32,314 (5.54 करोड़) मतदाता पंजीकृत थे, जिसके मुकाबले अंतिम सूची में कुल 99.77 लाख यानी करीब एक करोड़ मतदाताओं के नाम सीधे तौर पर गायब हो गए हैं। इस मामले पर मीडिया में चल रहे विश्लेषणों और 'द वायर' की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची में इतनी बड़ी कटौती लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में एक असाधारण घटना है, जो चुनाव आयोग के डेटा सत्यापन और जमीनी स्तर पर नाम हटाने के लिए अपनाए गए मापदंडों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।

A massive reduction of 10 million names in Karnataka’s final electoral roll raises serious questions about

इस पूरी प्रक्रिया के सांख्यिकीय विश्लेषण को देखें तो 16 जून को दर्ज कुल मतदाताओं की तुलना में मंगलवार को प्रकाशित अंतिम सूची में लगभग 18 प्रतिशत की भारी कमी आई है। निर्वाचन अधिकारियों ने शुरुआत में राज्य के 5.54 करोड़ मतदाताओं के लिए गणना फॉर्म तैयार किए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर सत्यापन के दौरान इनमें से केवल 4.46 करोड़ फॉर्म ही वापस आ सके, जिससे शुरुआती चरण में ही 19.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इसके बाद आयोजित किए गए एसआईआर के दावों और आपत्तियों के चरण में चुनाव आयोग ने 10.08 लाख नए नामों को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने की मंजूरी दी, जबकि 1.88 लाख अन्य नामों को हटाने के लिए चिह्नित किया गया। अंतिम सूची का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि 24 अगस्त को जारी मसौदा सूची की तुलना में अंतिम रूप में कुल मिलाकर 8.2 लाख नाम और जुड़ गए, जिसके बाद अंतिम आंकड़ा साढ़े चार करोड़ के पार पहुंच सका।

A massive reduction of 10 million names, in Karnatakas final electoral roll, raises serious questions

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अंतिम मतदाता सूची में लैंगिक संतुलन के लिहाज से महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक दर्ज की गई है, जिसमें 2.25 करोड़ पुरुष, 2.29 करोड़ महिलाएं और 2,841 थर्ड जेंडर के मतदाता शामिल हैं। इनके अलावा, सुरक्षा बलों और सरकारी सेवाओं से जुड़े 44,322 सर्विस इलेक्टर्स (सेवा मतदाता) भी इस सूची का हिस्सा बनाए गए हैं। आयु वर्ग के दृष्टिकोण से देखें तो कर्नाटक की इस अंतिम सूची में 30 से 39 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा हैं। इसके बाद 40 से 49 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत और 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि राज्य की चुनावी राजनीति में युवा और कामकाजी आबादी की भूमिका सबसे निर्णायक रहने वाली है।


चुनाव अधिकारियों ने सूची से एक करोड़ के करीब नाम हटाए जाने के पीछे मुख्य रूप से प्रवासन, अनुपस्थिति और मृत्यु को तकनीकी कारण बताया है। विभाग द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार, मसौदा मतदाता सूची से ही 65 लाख से अधिक लोगों के नाम इस आधार पर हटा दिए गए थे कि वे स्थायी रूप से दूसरी जगहों पर चले गए हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 19 lakh लोगों के नाम लंबे समय से 'अनुपस्थित' होने के कारण हटाए गए, जबकि करीब 10 लाख अन्य लोगों के नाम उनकी मृत्यु हो जाने के कारण मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं। हालांकि, मुख्य चुनाव अधिकारी द्वारा पूर्व में 'मैपिंग' प्रक्रिया के दौरान 2025 की मतदाता सूची में 5.57 करोड़ लोगों के शामिल होने की बात कही गई थी, जिससे तुलना करने पर अंतिम सूची में कुल 1.02 करोड़ नामों की भारी कमी साफ दिखाई देती है।

पिछले साल जून में बिहार से शुरू हुई इस विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर देश भर में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लगातार बड़े विवाद सामने आते रहे हैं। इस राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया के दौरान जिस बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से काटे गए हैं, उसने चुनावी पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं को चिंतित कर दिया है। समाचार पोर्टल 'द वायर' की खोजी रिपोर्ट में इस बात का दावा किया गया है कि इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के तौर-तरीकों पर लगातार गंभीर सवाल उठे हैं और यह आशंका जताई जा रही है कि इस व्यापक छंटनी का सबसे गंभीर और असमान असर समाज के वंचित, गरीब और हाशिए पर मौजूद तबकों पर पड़ा है, जिनकी आवाज प्रशासनिक स्तर पर आसानी से नहीं सुनी जाती।


कर्नाटक में चल रही इस पूरी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता पर तब बड़ा संकट खड़ा हो गया, जब बूथ स्तर पर नाम हटाने को लेकर राजनीतिक रस्साकशी शुरू हुई। मीडिया रिपोर्टों और खासकर 'द वायर' की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक में एसआईआर प्रक्रिया उस समय विवादों के घेरे में आ गई जब यह तथ्य सामने आया कि भाजपा के कुछ लोगों और बूथ-स्तरीय एजेंटों ने मतदाता सूची से नाम हटाने की मांग करते हुए बड़ी संख्या में 'फॉर्म-7' जमा करने की कोशिश की थी। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि इनमें से कई मामलों में मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर करवाने के लक्षित प्रयास किए जा रहे थे, जिसने इस प्रशासनिक पुनरीक्षण प्रक्रिया को एक नए राजनीतिक विवाद में धकेल दिया है।

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