पत्रकारिता को लेकर सरकार सख्त: आईटी नियम, ब्रॉडकास्टिंग बिल और डीपीडीपी कानून या अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश ?Are IT rules, Broadcasting Bill DPDP Act, curbing freedom of expression
आदिल खान (संपादकीय):भारत सरकार डिजिटल स्पेस को सुरक्षित, पारदर्शी और नागरिकों के अनुकूल बनाने के लिए लगातार कानूनी बदलाव और नियामक कदम उठा रही है। वर्तमान में इंटरनेट पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते दुरुपयोग, डीपफेक यानि कृत्रिम रूप से निर्मित छवि के खतरों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की तकनीकी जवाबदेही को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय बेहद संवेदनशील और आक्रामक रुख अपना रहे हैं। आज के डिजिटल दौर में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के साथ-साथ कई ऐसी तकनीकी चुनौतियां सामने आई हैं, जो सीधे नागरिकों की प्राइवेसी और सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। एआई उपकरणों की मदद से किसी भी व्यक्ति या सार्वजनिक चेहरे की झूठी तस्वीरें और सिंथेटिक वीडियो बनाकर इंटरनेट पर प्रसारित किए जा रहे हैं, जो एक गंभीर साइबर अपराध है। इसी प्रकार कई बार बड़े वीडियो शेयरिंग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के स्वचालित एआई सिस्टम मूल विजुअल कंटेंट और सामान्य रूप से संपादित की गई वीडियो फाइलों को गलत तरीके से 'सिंथेटिक' या 'एआई-जनरेटेड' के रूप में चिन्हित कर देते हैं, जिससे मूल रचनाकारों को तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सरकार का उद्देश्य डिजिटल इकोसिस्टम में इसी अराजकता और तकनीकी विसंगतियों को ठीक करना है।
इस पूरे कानूनी और नियामक मंथन के केंद्र में वर्तमान समय में जो सबसे बड़ा मुद्दा उभर कर आया है, वह है डिजिटल पत्रकारों की आधिकारिक पहचान और क्रेडिबिलिटी का सवाल। आज के दौर में इंटरनेट की व्यापकता के कारण प्रामाणिक और रजिस्टर्ड मीडिया संस्थानों तथा केवल शौकिया तौर पर चलाए जा रहे व्यक्तिगत पेजों के बीच की तकनीकी लकीर धुंधली हो गई है। जब कोई भी अनाम या अनरजिस्टर्ड अकाउंट बिना किसी जवाबदेही के भ्रामक तथ्य पोस्ट करता है, तो उससे फील्ड पर काम करने वाले देश के पत्रकारों की साख को भी अनजाने में नुकसान पहुंचता है। यही कारण है कि विभिन्न नीति निर्माता डिजिटल मीडिया में एक पारदर्शी पहचान तंत्र स्थापित करने पर जोर दे रहे हैं, ताकि समाज में सही और प्रामाणिक सूचना देने वाले पत्रकारों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा की जा सके और उन्हें एक विशिष्ट व गौरवशाली पहचान मिल सके।
इस प्रशासनिक सुधार की वास्तविक और कानूनी शुरुआत माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों और संवैधानिक व्याख्याओं के बाद सबसे ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी है। साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक मामले में निजता के अधिकार को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया था। इसी न्यायिक फैसले की अनिवार्यता और देश की संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसा सख्त कानून तैयार किया। यह डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 अपने कड़े नियमों और संपूर्ण तकनीकी ढांचे के साथ देश भर में पूरी तरह लागू हो चुका है, जिससे ऑनलाइन डेटा का संग्रहण अब बेहद संवेदनशील हो गया है। इस कानून के तहत एक बहुत बड़ा अनुपालन मील का पत्थर आने वाली 13 नवंबर 2026 को तय किया गया है, जिसके बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यूज़र्स की सहमति को प्रबंधित करने वाले कंसेंट मैनेजर्स से जुड़े कड़े और अभूतपूर्व नियम पूरी तरह प्रभावी हो जाएंगे। डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर के संदर्भ में यह कानून बेहद कड़ा रुख अपनाता है क्योंकि समाचार वेबसाइटों पर हर दिन लाखों पाठकों का आना-जाना होता है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर को डेटा फिड्यूशियरी यानी डेटा का कानूनी कस्टोडियन माना गया है, जिसकी जिम्मेदारी यूज़र के डेटा की शत-प्रतिशत सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के ऑनलाइन यूज़र्स और पाठकों के डेटा की अनधिकृत ट्रैकिंग या उनकी व्यावसायिक प्रोफाइलिंग करने पर कानून के तहत पूरी तरह प्रतिबंध है। डीपीडीपी एक्ट के इन कड़े नियमों, यूज़र प्राइवेसी के हनन और सुरक्षा में चूक सिद्ध होने पर सरकार ने अत्यधिक सख्त आर्थिक दंड तय किए हैं, जिसके तहत लापरवाही सिद्ध होने पर न्यूनतम 50 करोड़ रुपए से लेकर अधिकतम 250 करोड़ रुपए तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जा सकता है।
Are IT rules, Broadcasting Bill, DPDP Ac, curbing freedom of expression
इसी निरंतरता में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा वर्ष 2026 में जारी किए गए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के कड़े संशोधनों तथा इसके कड़े मसौदे के सरकारी आदेशों के तहत डिजिटल पब्लिशर्स और मध्यस्थों के लिए जवाबदेही का दायरा बहुत बढ़ा दिया गया है। सरकारी आदेश या अदालती निर्देशों के बाद डिजिटल मध्यस्थों को किसी भी आपत्तिजनक या अवैध कंटेंट को मात्र 3 घंटे के भीतर और कुछ बेहद संवेदनशील मामलों में मात्र 2 घंटे के भीतर इंटरनेट से पूरी तरह हटाना अनिवार्य किया गया है। वर्तमान में सरकार आगामी नए कानून ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज रेगुलेशन बिल के माध्यम से ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल समाचार खातों को एक सांझा और संगठित नियामक ढांचे के तहत लाने के लिए लगातार समीक्षा और डिजिटल स्टेकहोल्डर्स के साथ परामर्श कर रही है। इसके साथ ही, पुराने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम को पूरी तरह से बदलकर भविष्य के संपूर्ण डिजिटल इकोसिस्टम को नियंत्रित करने के लिए सरकार एक और कानून डिजिटल इंडिया एक्ट लाने की व्यापक तैयारी कर रही है।
इन कड़े आगामी प्रावधानों के बीच, जो लोग लीगल पब्लिशर नहीं हैं यानी जिन्होंने नियमों के तहत अपनी संस्था का पंजीकरण नहीं कराया है, उन पर कड़े कानूनी शिकंजे की पूरी संभावना है। ऐसे अनरजिस्टर्ड और अवैध समाचार पोर्टल्स या अनधिकृत रूप से कंप्यूटर जनरेटेड पीडीएफ ई-पेपर प्रसारित करने वाले तत्वों के खिलाफ सरकार बेहद आक्रामक कार्रवाई की तैयारी में है। यदि कोई इकाई बिना शिकायत अधिकारी और बिना किसी मान्यता प्राप्त काउंसिल सदस्यता के न्यूज़ रूम चलाती हुई पाई जाती है, तो उसकी कानूनी सुरक्षा पूरी तरह समाप्त कर दी जाएगी। साथ ही, इन अनधिकृत संचालकों पर बिना किसी सुरक्षा कवच के सीधे भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के तहत व्यक्तिगत रूप से गंभीर आपराधिक मुकदमे और व्यक्तिगत एफआईआर दर्ज की जा सकती है। फेसबुक, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे बड़े टेक प्लेटफॉर्म्स को भी कड़े निर्देश हैं कि वे इन गैर-कानूनी खातों और अनधिकृत न्यूज़ लिंक्स की रीच को पूरी तरह फ्रीज करें या उनके पेजों को हमेशा के लिए डिलीट कर दें। आने वाले समय में केवल वही ऑनलाइन या डिजिटल इकाइयाँ पूरी तरह सुरक्षित और स्थापित रह पाएँगी, जो देश के इन सभी नए आईटी नियमों, प्राइवेसी एक्ट और इन भारी जुर्मानों से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों का कड़ाई से पालन करती हैं।
हालाँकि, इन व्यापक प्रशासनिक बदलावों के बीच मीडिया हलकों में इस बात को लेकर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है कि क्या इतने कड़े नियमों से कहीं न कहीं आम नागरिकों और स्वतंत्र डिजिटल रचनाकारों की मुखर आवाज़ पर असर पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि जहां एक तरफ डिजिटल स्पेस को सुरक्षित और अनुशासित करना वक्त की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नियमों की जटिलता के चलते जमीनी स्तर की सच्ची खबरों और रचनात्मक आलोचनाओं का गला न घुट जाए। मीडिया विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि इन प्रावधानों का दायरा अत्यधिक सख्त रहा, तो समाज के बुनियादी मुद्दों और व्यवस्थागत कमियों को सामने लाने वाले छोटे और स्वतंत्र डिजिटल माध्यमों के लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में, शासन और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत जनता की स्वतंत्र आवाज़ और अभिव्यक्ति के अधिकारों के बीच एक स्वस्थ और पारदर्शी संतुलन बनाकर चलें।

















