लालफीताशाही और प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम: केन्द्रीय लोक शिकायत विभाग की 53वीं रिपोर्ट ने खोली दावों की पोल!The consequence of red tape, administrative negligence The 53rd report, of the Central
(संपादकीय राजकमल गुप्ता): प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग द्वारा जारी की गई सितंबर 2026 की केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली की 53वीं मासिक रिपोर्ट ने सरकारी तंत्र के भीतर चल रही मनमानी और जमीनी स्तर की असंवेदनशीलता की पोल खोल दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 में केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों द्वारा कुल 2,38,579 शिकायतों का निवारण किया गया है, और वर्ष 2026 के दौरान शिकायत निवारण का औसत समय 13 दिन रहा है। एक तरफ सरकार त्वरित निपटान और पारदर्शी व्यवस्था के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ रिकॉर्ड संख्या में आ रही शिकायतें इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि देश के आम नागरिक आज भी अपनी बुनियादी और न्यायसंगत समस्याओं के लिए किस हद तक संघर्ष करने को विवश हैं।

निचले स्तर पर मामलों को दबाने की प्रवृत्ति की जमीनी हकीकत
सीपीग्राम्स पोर्टल पर लगातार बढ़ती शिकायतों का यह सैलाब इस बात का अकाट्य सबूत है कि कई मामलों को जानबूझकर निचले प्रशासनिक स्तर पर ही दबा दिया जाता है। जब आम आदमी की स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं होती, जब भ्रष्टाचार और लापरवाही के स्थानीय मोर्चों पर अधिकारी फाइलों को फाइलों में ही दफना देते हैं, तब जाकर जनता को मजबूरन केंद्रीय पोर्टल का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। यह स्थिति इस बात को उजागर करती है कि जिला और राज्य स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी निभाने में विफल हो रही है, जिससे केंद्र सरकार के मंचों पर शिकायतों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
The consequence of red tape, administrative negligence The 53rd report, of the Central
राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव का काला सच!
इस व्यवस्था का सबसे डरावना और निंदनीय पहलू यह है कि कई संवेदनशील मामलों में शिकायतकर्ताओं पर लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव बनाया जाता है। जब कोई पीड़ित नागरिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता है, तो स्थानीय स्तर के रसूखदार तत्व और भ्रष्ट अधिकारी मिलकर उसे चुप कराने के हथकंडे अपनाते हैं। कई मामलों में तो यह भी पाया गया है कि जनता की जायज शिकायतों को बिना किसी ठोस समाधान के ही जबरन 'फोर्स क्लोज' (Force Close) कर दिया जाता है, ताकि कागजों में सब कुछ ठीक-ठाक और चमकदार दिखाई दे। जनता के साथ होने वाला यह छल न केवल प्रशासनिक जवाबदेही की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना के भी पूरी तरह खिलाफ है।
प्रमुख आंकड़े और मंत्रालयों की स्थिति क्या है ?
रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 में CPGRAMS पोर्टल पर 2,27,837 नई लोक शिकायतें प्राप्त हुईं और 85,687 शिकायतें अभी भी लंबित हैं। इस महीने सबसे अधिक 35 प्रतिशत शिकायतें सीधे तौर पर श्रम और रोजगार मंत्रालय (37,492 शिकायतें), वित्तीय सेवा विभाग - बैंकिंग प्रभाग (31,968 शिकायतें) और रेल मंत्रालय (9,914 शिकायतें) जैसे प्रमुख विभागों की ओर निर्देशित थीं। यह आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि देश के सबसे संवेदनशील और सेवा-उन्मुख क्षेत्रों में किस स्तर पर आम जनता का उत्पीड़न हो रहा है।
इसके अलावा, सामान्य सेवा केंद्रों (CSC) के माध्यम से सितंबर महीने में 12,996 शिकायतें दर्ज की गईं, जो यह दर्शाती हैं कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में लोग न्याय पाने के लिए किस हद तक जूझ रहे हैं। हालांकि रिपोर्ट में डाक विभाग, वित्तीय सेवा विभाग (बीमा प्रभाग), दूरसंचार विभाग, वस्त्र मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय और पर्यटन मंत्रालय को जीआरएआई (GRAI) रैंकिंग में शीर्ष पर दिखाया गया है, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर प्रशासनिक उत्पीड़न और दबाव की संस्कृति समाप्त नहीं होती, तब तक ऐसे सूचकांक केवल कागजी उपलब्धियां बनकर रह जाएंगे।
यदि प्रशासनिक मशीनरी अपनी जवाबदेही तय करने के बजाय इसी तरह मामलों को दबाने और जनता के उत्पीड़न का जरिया बनी रही, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठना तय है। सरकार को इन आंकड़ों से सीख लेते हुए केवल ऑनलाइन पोर्टल की खानापूर्ति करने के बजाय उन भ्रष्ट अधिकारियों और स्थानीय तत्वों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए जो फाइलों को दबाते हैं और पीड़ितों पर दबाव बनाते हैं।











