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समाज संगठित होगा तो राष्ट्र सशक्त होगा: विभाग प्रचार प्रमुख संतोष नौरिया

  • Feb 24
  • 2 min read

डोलरिया/नर्मदापुरम: संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में डोलरिया खंड केंद्र पर 'प्रमुख जन गोष्ठी' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में नर्मदापुरम विभाग प्रचार प्रमुख संतोष नौरिया एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला गौ सेवा प्रमुख पुष्पेंद्र उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के पूजन, अतिथि परिचय और एकल गीत के साथ हुआ।

संगठन और एकता पर जोर

मुख्य वक्ता संतोष नौरिया ने अपने संबोधन में 'संगच्छध्वं संवदध्वं' के मंत्र के साथ समाज की एकजुटता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की मजबूती के लिए हिंदू समाज का संगठित होना अनिवार्य है। इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि हजार वर्षों की पराधीनता का एक बड़ा कारण समाज की आंतरिक कमजोरियाँ थीं। उन्होंने आह्वान किया कि खान-पान, भाषा और मान्यताओं की विविधता के बावजूद 'हम सब एक हैं' का भाव जागृत करना आवश्यक है।

संघ की कार्यपद्धति और विचारधारा

संतोष नौरिया ने स्पष्ट किया कि संघ किसी का विरोध नहीं करता और न ही राजनीति या प्रतिक्रिया की भावना से कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ राम और कृष्ण के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देता है और पूर्णतः स्वावलंबी है। यह संगठन किसी बड़ी कंपनी के सहयोग से नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों की 'गुरु दक्षिणा' से संचालित होता है।

संस्थापक डॉ. हेडगेवार का स्मरण

शताब्दी यात्रा का वर्णन करते हुए उन्होंने संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंग साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे बचपन से ही हेडगेवार के मन में राष्ट्रभक्ति कूट-कूट कर भरी थी, जिसके कारण उन्हें छात्र जीवन में 'वंदे मातरम्' का उद्घोष करने पर विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया था। क्रांतिकारी आंदोलनों और जेल यात्राओं के माध्यम से उनका राष्ट्र के प्रति समर्पण सदैव बढ़ता रहा।

पंच परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण का रोडमैप

गोष्ठी में 'पंच परिवर्तन' के अंतर्गत पाँच मुख्य बिंदुओं पर चर्चा की गई:

कुटुंब प्रबोधन: परिवार को संस्कारों का केंद्र बनाना।

सामाजिक समरसता: जाति-भेद से ऊपर उठकर एकता कायम करना।

स्वदेशी जीवन शैली: भारतीय उत्पादों और मूल्यों को अपनाना।

पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति की रक्षा का संकल्प।

नागरिक शिष्टाचार: अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का पालन।

उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है। जब व्यक्ति बदलता है, तो परिवार बदलता है, जिससे समाज में सुधार आता है और अंततः राष्ट्र सशक्त बनता है। उन्होंने अनुशासन, नशामुक्ति और ईमानदारी को व्यक्तिगत चरित्र निर्माण का आधार बताया।

प्रबुद्ध जनों की गरिमामयी उपस्थिति

इस गोष्ठी में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिनमें उन्नत कृषक, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, सरकारी अधिकारी, व्यापारी, खिलाड़ी और विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संगठनों के प्रमुख शामिल थे। कार्यक्रम का समापन सामूहिक 'वंदे मातरम्' गान के साथ हुआ।

 
 

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