बेतुल:PESA एक्ट के 'दस्तावेजों' और 'प्रशासनिक दावों' के बीच फंसी 18 आदिवासियों की किस्मत, "देव स्थान" पर केसे गन्दगी का फरमान? ReligiousFaithProtection, CommunityRightsViolation, AdministrativeNeglige
- May 9
- 2 min read
शाहपुर/बैतूल | सिलपटी ग्राम पंचायत में कचरा घर (ट्रेंचिंग ग्राउंड) निर्माण को लेकर छिड़ा विवाद अब केवल जमीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासियों की धार्मिक आस्था और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है। शासन द्वारा जिस जमीन पर ट्रैक्टर चलाकर फसलें उजाड़ी गई हैं, वहां आदिवासियों का प्राचीन 'मुड़ा देव स्थान' (शिव मंदिर) भी स्थित है, जिसे लेकर क्षेत्र में भारी तनाव व्याप्त है।

धार्मिक आस्था पर चोट: क्या कहते हैं नियम?
ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों का आरोप है कि प्रशासन ने कार्रवाई के दौरान आदिवासियों के देव स्थान का भी लिहाज नहीं रखा। उल्लेखनीय है कि शासकीय नियमों और पेसा (PESA) एक्ट के तहत धार्मिक और सामुदायिक महत्व के स्थानों के लिए कड़े प्रावधान हैं:
अनिवार्य परामर्श: मध्य प्रदेश राजपत्र के अनुसार, किसी भी शासकीय या सामुदायिक भूमि के उपयोग में परिवर्तन (Diversion) करने से पूर्व ग्राम सभा से परामर्श करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
सांस्कृतिक संरक्षण: नियमों के तहत प्रशासन ऐसी किसी भी भूमि का अधिग्रहण नहीं कर सकता जिससे किसी समुदाय की सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान जुड़ी हो, विशेषकर यदि ग्राम सभा इसका विरोध कर रही हो।
ग्राम सभा का प्रस्ताव: सिलपटी ग्राम सभा ने 27/07/2024 को स्पष्ट प्रस्ताव पारित कर कहा था कि उक्त भूमि पर प्राचीन शिव मंदिर (मुड़ा देव स्थान) स्थित है, जिससे लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है, अतः यहाँ कचरा घर का निर्माण पूर्णतः अनुचित है।
ReligiousFaithProtection, CommunityRightsViolation, AdministrativeNegligence
जयस (JAYS) की चेतावनी: "देव स्थान का अपमान नहीं सहेंगे"
इस मामले में जयस संगठन के जिला संरक्षक राजा धुर्वे ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि आदिवासियों के देव स्थान पर इस तरह की कार्रवाई सीधे तौर पर उनकी संस्कृति पर हमला है। उन्होंने चेतावनी दी है कि प्रशासन संवैधानिक दायरे में रहकर काम करे, अन्यथा जयस इस अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेगा।
प्रशासनिक मजबूरी बनाम आस्था
नगर परिषद शाहपुर के प्रभारी सीएमओ केसी ऊईके का पक्ष है कि निकाय के पास कचरा डंप करने के लिए अन्य कोई भूमि उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि जमीन शासन से आवंटित है, हालांकि उन्होंने ग्राम सभा के विरोध और देव स्थान से जुड़े नियमों पर अनभिज्ञता जताई है।
प्रमुख बिंदु जो प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं:
दशकों पुराना कब्जा: ग्रामीण यहाँ 1968 से खेती कर रहे हैं और शासन को लगातार जुर्माना भी भर रहे हैं।
बिना सूचना कार्रवाई: 25 जुलाई 2024 को बिना किसी पूर्व सूचना के आदिवासियों की हरी फसलों को नष्ट कर दिया गया।
पर्यावरण संकट: कचरा घर तवा नदी के समीप होने के कारण वन्यजीवों और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी बड़ा खतरा माना जा रहा है。

एक ओर प्रशासन अपनी विकास संबंधी मजबूरी बता रहा है, वहीं दूसरी ओर 'मुड़ा देव स्थान' और PESA कानून के दस्तावेज़ प्रशासन की कार्रवाई को 'अवैध' और 'आस्था विरोधी' करार दे रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इन पवित्र स्थानों और कानूनी प्रावधानों का सम्मान करते हुए कदम पीछे खींचेगा?











