कागजों में सिमटा ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’, शाहपुर में माचना नदी और सार्वजनिक स्थलों पर गंदगी का साम्राज्य: प्रशासन की विफलता उजागर PublicHealthHazards, EnvironmentalNegligence, WaterConservationCrisis
- Apr 18
- 2 min read
शाहपुर नगर में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशानुसार चल रहे "जल गंगा संवर्धन अभियान" का जमीनी स्तर पर कोई सकारात्मक असर नहीं दिख रहा है। प्रशासन द्वारा जोर-शोर से चलाए जा रहे इस अभियान के बावजूद, शहर के प्रमुख जल स्रोत और सार्वजनिक स्थान गंदगी और प्रदूषण के ढेर में बदल गए हैं। उपलब्ध प्रमाणों (फोटोग्राफ) से यह पूरी तरह साफ हो गया है कि अभियान केवल कागजी दावों और फोटो सेशन तक सीमित रह गया है, जबकि धरातल पर वास्तविकता अत्यंत चिंताजनक है।

माचना नदी की दयनीय स्थिति: काई और कचरे से भरा पात्र नगर की जीवनदायिनी माचना नदी की स्थिति अत्यंत दयनीय पाई गई है। नदी के संरचण के लिए बने प्रमुख घाटों और पुल के आसपास का पात्र पूरी तरह से काई (algae scum) से ढका हुआ है और पानी अत्यंत गंदा और स्थिर है। पुल के किनारे और नदी के पात्र के पास बड़े पैमाने पर कचरा (प्लास्टिक के रैपर, घरेलू कचरा) जमा है, जो सीधे तौर पर पानी को प्रदूषित कर रहा है। नदी की स्वच्छता या उसके संरक्षण के लिए कोई भी ठोस और प्रभावी प्रयास धरातल पर नज़र नहीं आते हैं।

सार्वजनिक स्थलों और जल स्रोतों के पास कचरे का अंबार नदी के अलावा, शहर के अन्य सार्वजनिक स्थल और पारंपरिक जल स्रोतों के पास का क्षेत्र भी कचरे के ढेर में बदल गया है। सूखे ब्रश, प्लास्टिक की थैलियां, पुरानी बोतलें (शराब की बोतलें) और अन्य घरेलू कचरा खुलेआम फैला हुआ है। यह स्थिति जल संरक्षण के अभियान के दावों को पूरी तरह झूठा साबित करती है।

PublicHealthHazards, EnvironmentalNegligence, WaterConservationCrisis
प्रशासन की उदासीनता पर गंभीर प्रश्न पूरे मामले में नगर परिषद शाहपुर की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। 'जल गंगा संवर्धन अभियान' के तहत भारी-भरकम राशि खर्च करने के दावों के बीच, धरातल पर स्थिति बेहद भयावह है। यदि समय रहते इन प्रमुख जल स्रोतों और सार्वजनिक स्थलों की सफाई और संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में शाहपुर गंभीर जल संकट और प्रदूषण की चपेट में आ सकता है। तस्वीरों से साफ है कि अभियान केवल कागजों पर ही दम तोड़ रहा है और शासन के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है।
निष्कर्ष: यदि समय रहते शासन ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया और नगर परिषद की जवाबदेही तय नहीं की, तो ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ का मूल उद्देश्य केवल सरकारी फाइलों में ही दफन होकर रह जाएगा।













