सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में पारदर्शिता की कमी पर जस्टिस उज्ज्वल भूयान ने उठाए सवाल: कहा—'जनता को जानने का अधिकार' JudicialTransparency, SupremeCourt, CollegiumSystem
- Aug 3
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भूयान ने न्यायपालिका की कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। शनिवार (1 अगस्त) को विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी (Vidhi Centre for Legal Policy) की रिपोर्ट 'द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स' (The Judicial Transparency Index) के विमोचन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति और तबादलों के कारणों को सार्वजनिक न करना एक चिंताजनक विषय है।

जस्टिस भूयान ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया और फैसलों की लाइव-स्ट्रीमिंग के जरिए अदालतें भले ही पारदर्शी हुई हों, लेकिन न्यायपालिका के अपने प्रशासनिक व संस्थागत निर्णयों में अभी भी खुलेपन का अभाव है।
मुख्य बिंदु:
कारणों का उल्लेख न होना पीछे हटने जैसा: उन्होंने ध्यान दिलाया कि हालिया कॉलेजियम प्रस्तावों में जजों की सिफारिश के पीछे के कारण दर्ज नहीं किए जा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया, "क्या हम पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हट रहे हैं?"
नागरिकों का अधिकार: जस्टिस भूयान ने कहा, "नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनके जज कौन बन रहे हैं और उन्होंने पहले किस तरह के फैसले दिए हैं। यह जानकारी पब्लिक डोमेन में होनी चाहिए।"
अयोग्य और असामाजिक तत्वों का प्रवेश रोकना जरूरी: पारदर्शिता न होने का नुकसान बताते हुए उन्होंने कहा कि बिना चर्चा और बिना कारण दिए की गई नियुक्तियों से ऐसे लोग न्यायपालिका में आ सकते हैं जो बाद में असंवैधानिक या गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी (जैसे किसी समुदाय विशेष पर टिप्पणी) करते हैं।
मेहनती जजों के साथ अन्याय: उन्होंने कहा कि जजों के चयन के कारण स्पष्ट न करना उन जजों की निष्ठा और बेहतरीन काम के साथ भी एक तरह का "अन्याय" है, जिन्होंने वास्तव में उत्कृष्ट कार्य किया है।
RTI और न्यायिक स्वतंत्रता: आरटीआई (RTI) अधिनियम के दायरे में मुख्य न्यायाधीश (CJI) के कार्यालय को लाने वाले संविधान पीठ के फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही (Accountability) के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विधि सेंटर की JALDI रिपोर्ट के अनुसार, 70 से अधिक संकेतकों पर सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की वेबसाइटों का मूल्यांकन किया गया, जिसमें पाया गया कि प्रस्ताव तो अपलोड किए जा रहे हैं, लेकिन सिफारिशों के पीछे के ठोस कारण गायब हैं।











