कौशल विकास की आड़ में ; सरकारी मशीनरी, अरबों की संपत्ति और गरीब छात्रों की छात्रवृत्ति हड़पने का PPP मॉडल!A nationwide PPP model, that misappropriates government machinery, assets worth billions,
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GAMĀKI OPINION
सवाल : क्या मध्य प्रदेश में नियमों को ताक पर रखकर 16 उत्कृष्ट आदिवासी आईटीआई को निजी एनजीओ 'परम फाउंडेशन' के हवाले करने की तैयारी; देश भर के वंचित युवाओं के तकनीकी भविष्य पर गहराता संकट नहीं ?
वैचारिकी : पंडित नरेंद्र मिश्रा ।

'पीपीपी मॉडल' : सार्वजनिक और तकनीकी शिक्षण ढांचे को सुनियोजित तरीके से निजी हाथों में सौंपने का एक चिंताजनक खेल मध्य प्रदेश में चल रहा है। राज्य शासन के तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग और निजी एनजीओ 'परम फाउंडेशन' (PanIIT Alumni Reach For Madhya Pradesh Foundation) की मिलीभगत से 16 सरकारी आईटीआई को पीपीपी मॉडल की आड़ में सौंपने का काम किया जा रहा है। यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 46 (कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शैक्षणिक व आर्थिक हितों की रक्षा) का खुला उल्लंघन प्रतीत होता है।
मध्य प्रदेश सरकार के 5 मई 2022 के मूल कैबिनेट नीति आदेश (क्र. एफ-15-2/2022/42-2) की कंडिका 1 और 4.1 के अनुसार, केवल उन्हीं आईटीआई का चयन होना था जहाँ मात्र 1 से 3 ट्रेड हों और छात्रों का नामांकन व प्लेसमेंट बहुत कम हो। साथ ही प्रति जिला अधिकतम एक आईटीआई ली जानी थी। परंतु धरातल पर पूरी छात्र संख्या और 6-6 ट्रेड वाली अव्वल संस्थाओं को एनजीओ को दिया जा रहा है। बैतूल,(2-3 संस्थाएं), धार (3 संस्थाएं) और झाबुआ (2 संस्थाएं) में एक ही जिले से कई-कई आईटीआई सूची में शामिल की गई हैं।
A nationwide PPP model, that misappropriates government machinery, assets worth billions,
हस्तांतरण सूची में शामिल 16 शासकीय आईटीआई:
बिरसा (बालाघाट), भीमपुर (बैतूल), शाहपुर (बैतूल), चकल्दी (सीहोर), कराहल (श्योपुर), पानसेमल (बड़वानी), बाकानेर/उमरबन (धार), डही (धार), गंधवानी (धार), मेघनगर (झाबुआ), थांदला (झाबुआ), खेड़ी/खालवा (खंडवा), भीकनगांव (खरगोन), मझौली (सीधी), चंदला (छतरपुर) और बाजना (रतलाम)।
पंडित मिश्रा का कहना है कि क्या प्रति संस्था 3 से 3.5 करोड़ की राशि एनजीओ को देना नजराना नहीं ?:मूल आदेश की कंडिका 8.2 के तहत सरकार न केवल बनी-बनाई सरकारी इमारतें, वर्कशॉप और हॉस्टल निजी संस्था को दे रही है, बल्कि प्रत्येक आईटीआई के लिए 3 से 3.5 करोड़ रुपये की एकमुश्त सरकारी राशि भी जारी कर रही है। यह फंड अनुसूचित जनजाति वित्त निगम, अनुसूचित जाति वित्त निगम, मेपसेट (MAPCET) और रोजगार निर्माण बोर्ड से 25-25% वसूला जा रहा है। सवाल उठता है कि क्या आदिवासियों के कल्याण का सरकारी बजट निजी एनजीओ की तिजोरी में भेजा जा रहा है?
एक सवाल यह भी सामने आता है कि क्या यह छात्रवृत्ति हड़पने का षड्यंत्र और वर्तमान से कई गुणा हजारों की भारी-भरकम फीस वसूली का खेल नहीं है ?
शासकीय आईटीआई में गरीब छात्रों को नाममात्र शुल्क पर शिक्षा मिलती है और सरकार से छात्रवृत्ति व निर्वाह भत्ता मिलता है। एनजीओ के हाथ में कमान आते ही इसे मुनाफाखोरी का माध्यम बनाया जा रहा है:
वर्ग / श्रेणी | सत्र 2025-26 वर्तमान सरकारी छात्रवृत्ति संरचना | प्रस्तावित निजीकरण के बाद का शोषण की स्पष्ट संभावना |
OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) | ₹5,840 (ट्यूशन फीस) + आय प्रमाण पत्र अनुसार निर्वाह भत्ता | फीस बढ़ाकर ₹20,000+ की जाएगी, छात्रवृत्ति के अलावा अतिरिक्त वसूली। |
ST (अनुसूचित जनजाति) | ₹8,840 (ट्यूशन फीस ₹5,840 + ₹3,000 निर्वाह भत्ता) | पूरी छात्रवृत्ति एनजीओ द्वारा हड़पने के साथ ₹3,000/माह मेस शुल्क का अतिरिक्त भार। |
SC (अनुसूचित जाति) | ₹8,340 (ट्यूशन फीस ₹5,840 + ₹2,500 निर्वाह भत्ता) | हॉस्टल व विविध शुल्कों के नाम पर गरीब परिवारों पर असहनीय बोझ। |
इसके अतिरिक्त प्रति छात्र ₹3,000 प्रति माह मेस शुल्क अलग से वसूला जाएगा, जिससे गांव-देहात के निर्धन छात्र तकनीकी शिक्षा से बाहर हो जाएंगे। यह आदिवासियों और कमजोर तबके के बच्चों को तकनीकी शिक्षा से वंचित कर उनके संवैधानिक अधिकारों पर सीधा डाका डालना प्रतीत होता है!"

इस पीपीपी मॉडेल की प्रक्रिया मे सरकारी मशीनरी और स्टाफ का जबरन विस्थापन क्यों?: पंडित नरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि कौशल विकास संचालनालय के पत्र (29-07-2026) के तहत इन सभी 16 आईटीआई से सरकारी मशीनरी, टूल्स, उपकरण व फर्नीचर अन्यत्र स्थानांतरित किए जा रहे हैं और नियमित शिक्षकों व छात्रों को दूसरी जगह धकेला जा रहा है, जिससे स्थापित सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो रहा है।
इस लेख के प्रकाशन के साथ साथ कौशल विकास विभाग के एक अधिकारी द्वारा गामाकी GAMĀKI MEDIA से बड़ा खुलासा किया है:
तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग के एक अधिकारी ने प्रदेश की सभी 16 आईटीआई की वास्तविक स्थिति पर खुलासा करते हुए बताया:"यह मामला किसी एक संस्थान का नहीं, बल्कि प्रदेश की 16 से अधिक चिन्हित शासकीय आईटीआई (बिरसा, भीमपुर, शाहपुर, चकल्दी, कराहल, पानसेमल, बाकानेर, डही, गंधवानी, मेघनगर, थांदला, खेड़ी, भीकनगांव, मझौली, चंदला और बाजना इत्यादि) के अस्तित्व का है। इनमें से अधिकांश संस्थाओं में ट्रेड पूरी क्षमता के साथ चल रहे हैं। इसके बावजूद नियमों को ताक पर रखकर जबरन सरकारी मशीनरी और स्टाफ को हटाया जा रहा है। सरकार इस एनजीओ को तैयार अधोसंरचना के साथ 3 से 3.5 करोड़ रुपये प्रति आईटीआई दे रही है। यह एनजीओ आईटीआई के कोर तकनीकी ट्रेड्स के इतर गैर-पारंपरिक और नर्सिंग जैसे कोर्सेज चलाने की योजना में है। सबसे गंभीर बात यह है कि छात्रों को मिलने वाली सरकारी छात्रवृत्ति (OBC: ₹5,840+भत्ता, ST: ₹8,840, SC: ₹8,340) को ध्यान में रखकर फीस सीधे कई गुणा तक बढ़ा दी जाएगी और प्रति माह मेस चार्ज अलग से वसूला जाएगा।












