कागजी योजनाओं और समीक्षा बैठकों का दौर: क्या 'जल जीवन 2.0' से बुझेगी गांवों की प्यास या सिर्फ बदलेंगे नाम? WaterScarcitySolutions, RuralWasteManagement, GovernmentInitiativesIndia
- May 23
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नई दिल्ली: देश के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की किल्लत और कचरा प्रबंधन की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। लेकिन सरकारी गलियारों में अब भी जमीनी सुधार से ज्यादा जोर समीक्षा बैठकों और नए डिजिटल पोर्टल्स पर है। पेयजल और स्वच्छता विभाग (DDWS) ने देश भर के 759 से अधिक जिला कलेक्टरों और जिला मजिस्ट्रेटों (DMs) के साथ एक राष्ट्रीय स्तर की समीक्षा बैठक की। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई इस बैठक का मुख्य एजेंडा 'जल जीवन मिशन (JJM) 2.0' के नए नियमों को लागू करना और 'ठोस कचरा प्रबंधन (SWM) नियम 2026' का पालन करवाना था।

सवाल यह है कि क्या केवल मिशन के आगे '2.0' लगा देने और नई समयसीमा तय कर देने से गांवों की सूरत बदल जाएगी?
इंफ्रास्ट्रक्चर तो बना, पर चालू हालत में कितने?
बैठक में पेयजल और स्वच्छता विभाग के सचिव अशोक के.के. मीना ने खुद स्वीकार किया कि मिशन अब उस चरण में पहुंच गया है जहां ध्यान सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर (Assets) बनाने के बजाय उनकी निरंतरता, देखरेख और गांवों को पानी की सही डिलीवरी देने पर होना चाहिए।
करोड़ों का खर्च, पर रखरखाव का संकट: जल जीवन मिशन के तहत अब तक देश के 5.91 लाख गांवों और 19.41 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक नल पहुंचाने का दावा किया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि कई गांवों में पाइपलाइन बिछने के कुछ महीनों बाद ही पानी आना बंद हो गया या पाइपलाइनें टूट गईं। अब सरकार कह रही है कि इन्हें अगले 25-30 सालों तक चालू रखना एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए अब 'ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस' (O&M) पर माथापच्ची की जा रही है।
2028 तक बढ़ी डेडलाइन: कैबिनेट ने जल जीवन मिशन की अवधि को बढ़ाकर दिसंबर 2028 तक कर दिया है। सरकार इसे अपनी उपलब्धि बता रही है, लेकिन पर्यावरणविदों और विश्लेषकों का मानना है कि यह इस बात का सबूत है कि योजना अपने पुराने लक्ष्यों को समय पर पूरा करने में नाकाम रही है। WaterScarcitySolutions, RuralWasteManagement, GovernmentInitiativesIndia
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद जागी सरकार!
बैठक में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (SWM) रूल्स 2026 को लेकर जिला कलेक्टरों को सख्त निर्देश दिए गए। दरअसल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) चल रही है, जिसके तहत कोर्ट लगातार सरकार की सुस्ती पर नजर रख रहा है।
कचरे के पहाड़ों से निपटने की मजबूरी: सरकार ने अब जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि वे 31 अक्टूबर तक अपने-अपने जिलों में कचरे के पुराने ढेरों (Legacy Waste Sites) की पहचान करें और उन्हें हटाने का काम शुरू करें। अगर सुप्रीम कोर्ट का दबाव न होता, तो क्या ग्रामीण इलाकों में वैज्ञानिक तरीके से कचरा निपटाने की यह जल्दबाजी दिखाई देती?
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का नया जाल: बैठक में 'सुजलम भारत', 'सुजल गांव आईडी' और 'जीआईएस-बेस्ड ट्रैकिंग' जैसे भारी-भरकम तकनीकी शब्दों और पोर्टल्स की प्रजेंटेशन दी गई। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि कई ग्राम पंचायतों के पास इन डिजिटल सिस्टम्स को ठीक से संभालने के लिए न तो तकनीकी स्टाफ है और न ही जरूरी संसाधन।
आदिवासी और पिछड़े इलाके अब भी हाशिए पर !
बैठक में यह बात भी सामने आई कि विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) और आदिवासी परिवारों तक अब तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं। सरकार अब दावा कर रही है कि वह 2027 तक इन इलाकों में 'सैचुरेशन' हासिल कर लेगी। लेकिन इतने सालों बाद भी इन संवेदनशील इलाकों का प्यासा रहना सरकारी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस खबर से जुड़े साक्ष्य और विस्तृत रिपोर्ट्स के लिए देखें:
भारत के ग्रामीण इलाकों में जल संकट, भूजल के गिरते स्तर और कचरा प्रबंधन की जमीनी हकीकत पर पर्यावरण रिपोर्ट पढ़ने के लिए: courtesy pib, Down To Earth या The Hindu (Eco-Business & Environment)









