भारत में सम्मान पुरस्कार दिए नहीं, बांटे जाते हैं(प्रथम भाग)SportsLegends, HonoringAthletes, IndianSportsHeroes
- Jan 28
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(प्रथम भाग)
आज भी देशभक्त सूबेदार सोमेश्वर दत्त सिंह का परिवार भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों से वंचित क्यों है? जिस परिवार का नाम खेलों की दुनिया में सबसे आदर और सम्मान से पुकारा जाता है, वह परिवार है सूबेदार सोमेश्वर दत्त सिंह का। उनके परिवार के सदस्यों—हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, कैप्टन रूप सिंह, अशोक कुमार और नेहा सिंह ने भारत के लिए ओलंपिक, विश्व कप और एशियन गेम्स में कुल तेरह पदक जीतकर भारत माँ को गौरवान्वित किया और दुनिया में भारत का मान बढ़ाया। इसके बावजूद, भारत सरकार की दृष्टि आज तक इन्हें इनके हक के सम्मान से सम्मानित करने पर नहीं गई।

भारत रत्न के सच्चे और सर्वप्रथम हकदार यदि इस देश में कोई खिलाड़ी हैं, तो वे हैं हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद। दुनिया ने उनकी लगन, मेहनत और खेल कौशल को देखते हुए उन्हें 'ध्यान सिंह' से 'ध्यानचंद' की उपाधि दी, लेकिन हमारी सरकारों के हाथ उन्हें भारत रत्न देने में आज तक कांप रहे हैं। भारत रत्न के लिए मेजर ध्यानचंद का नाम आते ही मानों प्रधानमंत्री के दस लाख के पेन की स्याही सूख जाती है। गनीमत है कि 1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित कर दिया गया, अन्यथा सम्मान न पाने वालों की सूची में वे आज भी वैसे ही रहते, जैसा व्यवहार उनके साथ भारत रत्न के मामले में किया जा रहा है।
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कैप्टन रूप सिंह, जिन्होंने अपने भाई मेजर ध्यानचंद के साथ मिलकर दुनिया की बड़ी ताकतों को ओलंपिक में धूल चटाई और भारत को दो ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाए, उनके हिस्से का पद्म सम्मान न देने की जैसे सरकारों ने कसम खा ली हो। जिस रूप सिंह को दुनिया ने सम्मान दिया, उन्हें उनके ही देश में ठुकराया गया। जिस जर्मनी को उन्होंने उनकी धरती पर पराजित किया, उसी जर्मनी ने 1972 म्यूनिख ओलंपिक में एक सड़क का नाम रूप सिंह के नाम पर रखा। वहीं, 2012 लंदन ओलंपिक में भी रूप सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया गया, लेकिन स्वतंत्र भारत की सरकारों को उनके खेल की चमक आज तक दिखाई नहीं दी।
विडंबना देखिए, जो टीमें विश्व कप में बारहवें स्थान पर आईं (जबकि कुल बारह ही टीमें थीं), उनके खिलाड़ी पद्म पुरस्कार के हकदार बना दिए गए। लेकिन वह खिलाड़ी, जिसकी स्टिक से निकले गोल की वजह से भारत ने विश्व विजेता बनने का गौरव हासिल किया, वह आज 50 साल बीत जाने के बाद भी पद्म पुरस्कार का हकदार नहीं बन सका। यह वर्ष तो अशोक कुमार के विश्व विजयी गोल का स्वर्ण जयंती वर्ष है; कितना श्रेष्ठ होता यदि उन्हें इस अवसर पर सम्मानित किया जाता।
ऐसा प्रतीत होता है कि आज पद्म पुरस्कार योग्यता देखकर नहीं, बल्कि विचारधारा के आधार पर बांटे जा रहे हैं। पूर्व की सरकारें तुष्टिकरण के आधार पर बांटती थीं और वर्तमान सरकारें विचारधारा की आड़ में दे रही हैं। चूंकि मेजर ध्यानचंद, कैप्टन रूप सिंह और अशोक कुमार न तो किसी राजनीतिक विचारधारा के पोषक रहे और न ही उनसे कोई वोट बैंक प्रभावित होता है, इसलिए वे इस अन्याय के शिकार होते चले गए।
अशोक कुमार केवल मेजर ध्यानचंद के पुत्र नहीं, बल्कि भारत के उन महान खिलाड़ियों में शुमार हैं जिन्होंने 70 के दशक में अपनी कला से दुनिया में भारत का डंका बजाया। पाकिस्तान के बेहतरीन सेंटर हाफ अख्तर रसूल ने स्वयं कहा था कि वे अशोक कुमार के खेल से खौफ खाते थे। अशोक कुमार ने 1970 से 1978 के बीच ओलंपिक, विश्व कप और एशियन गेम्स में स्वर्ण, रजत और कांस्य पदकों की झड़ी लगा दी, किंतु सरकारों ने उनकी सेवा को ऐसे भुला दिया जैसे उन्होंने कुछ किया ही न हो।
आश्चर्य और दुख तब होता है जब बिना पदक विजेताओं और गुटखा-पान मसाला या शराब का विज्ञापन करने वालों तक को पद्म सम्मान दे दिया जाता है। जो लोकतंत्र के मंदिर में रिश्वत ले, वह सम्मान का हकदार हो जाता है, लेकिन जिसने देश की खातिर हिटलर के बड़े प्रलोभनों को ठुकरा दिया, वह भारत रत्न का हकदार नहीं माना जाता। आज सम्मान इस आधार पर तय होता है कि भविष्य में किस व्यक्ति या उसके परिवार से राजनीतिक फायदा होगा।
भले ही सरकारी सम्मान से ऐसे महान खिलाड़ियों को दूर रखा गया हो, लेकिन भारत के जनमानस के दिलों में वे गहराई से बसते हैं।
— हेमंत चंद्र दुबे 'बबलू'









