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दानवाखेड़ा त्रासदी: पद पर बैठे 'जिम्मेदारों' की नींद टूटी, पर मासूमों की जान जाने के बाद! LocalGovernanceCrisis, PoliticalAccountability, PublicInfrastructureIssues

Mar 21
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घोड़ाडोंगरी: बैतूल जिले के दानवाखेड़ा गांव में फैली बीमारी और दो मासूमों की मौत ने न केवल प्रशासन, बल्कि स्थानीय जन प्रतिनिधियों की कार्यशैली पर भी कालिख पोत दी है। ताज्जुब की बात यह है कि जो लोग आज 'जांच' और 'कार्यवाही' की मांग कर रहे हैं, वे खुद पिछले ढाई सालों से सत्ता और संसाधनों की चाबी थामे बैठे हैं।

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ढाई साल का 'मौन' और अब फोटो की राजनीति

पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और वर्तमान जनपद अध्यक्ष राहुल उइके का गांव का दौरा चर्चा का विषय बना हुआ है। राहुल उइके ने इसे 'प्रशासनिक विफलता' बताया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि:

  • जनपद अध्यक्ष के नाते पिछले 2.5 वर्षों में उन्होंने इस सुदूर आदिवासी गांव की सुध क्यों नहीं ली?

  • क्या जनपद के फंड से यहाँ शुद्ध पेयजल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए कोई ठोस प्रस्ताव भेजा गया था?

  • सत्ता के महत्वपूर्ण पद पर होने के बावजूद, उन्होंने तब तक आवाज़ क्यों नहीं उठाई जब तक मीडिया ने इस मुद्दे को नहीं उछाला?

ग्रामीणों के बीच यह चर्चा आम है कि जब तक बच्चे सुरक्षित थे, तब तक कोई नेता नहीं दिखा। आज जब गांव मातम में है, तो इसे 'सियासी जमीन' की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

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दिग्विजय सिंह का ट्वीट और विपक्षी घेराबंदी

इस मुद्दे ने अब राज्य स्तर पर तूल पकड़ लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया (X) पर ट्वीट कर सरकार और स्थानीय प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। उनके ट्वीट ने प्रशासन में हड़कंप तो मचाया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि स्थानीय स्तर पर विपक्ष और वर्तमान जनप्रतिनिधि दोनों ही गांव की समस्याओं से बेखबर थे।

मीडिया के दबाव में जागी मशीनरी

यह बेहद शर्मनाक है कि जिस गांव में सालों से पीने के पानी का संकट था, वहां मीडिया में खबर आते ही PHED ने रातों-रात नया हैंडपंप लगा दिया। यह साबित करता है कि संसाधन मौजूद थे, बस उन्हें इस्तेमाल करने की 'इच्छाशक्ति' की कमी थी।



श्रमिक आदिवासी संगठन का मौन संघर्ष

जहाँ एक ओर नेता फोटो खिंचवाने की होड़ में हैं, वहीं श्रमिक आदिवासी संगठन पिछले 30 सालों से यहाँ की ज़मीन और हक की लड़ाई लड़ रहा है। संगठन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की यह 'जुगलबंदी' हमेशा मासूमों की जान पर भारी पड़ती है।


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प्रमुख बिंदु: जो सवाल अधूरे हैं

  1. स्थानीय विधायक की चुप्पी: क्षेत्रीय विधायक गंगा सज्जन सिंह उइके की इस त्रासदी पर खामोशी क्षेत्र की जनता को अखर रही है।

  2. जनपद की भूमिका: जनपद पंचायत का मुख्य कार्य ही ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा सुधारना है। क्या दानवाखेड़ा जनपद की फाइलों से गायब था?

  3. सिर्फ 'बैंड-एड' समाधान: हैंडपंप लगा देना काफी नहीं है; जब तक पक्की सड़क और नियमित स्वास्थ्य केंद्र नहीं बनता, ऐसी घटनाएं दोबारा हो सकती हैं।

निष्कर्ष: दानवाखेड़ा की घटना यह सबक देती है कि जब तक जनप्रतिनिधि 'पद' का उपयोग केवल राजनीति के लिए करेंगे और विकास के लिए नहीं, तब तक मासूमों की बलि इसी तरह चढ़ती रहेगी। अब देखना यह है कि राहुल उइके और प्रशासन मिलकर इस गांव की तस्वीर सच में बदलते हैं या यह सिर्फ एक और 'सियासी दौरा' बनकर रह जाएगा।


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