सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026: सभ्यता के अटूट संकल्प और सांस्कृतिक गौरव का सहस्राब्दी उत्सव SomnathTemple SpiritualHeritage CulturalRevival
- Jan 10
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प्रभास पाटन (गुजरात) | 10 जनवरी, 2026
"सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्..." – द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का यह प्रथम श्लोक सोमनाथ को भारत की आध्यात्मिक चेतना के शिखर पर स्थापित करता है। गुजरात के वेरावल तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर मात्र पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि भारत के 'स्व' (Self) और 'स्वाभिमान' की जीवित गाथा है।

1. स्वाभिमान पर्व: विनाश पर आस्था की ऐतिहासिक विजय
8 जनवरी से 11 जनवरी 2026 तक आयोजित हो रहा 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' राष्ट्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। यह आयोजन दो प्रमुख कालखंडों का संगम है:
सभ्यता का संघर्ष (1026-2026): जनवरी 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले बड़े विदेशी आक्रमण के 1,000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि बर्बरता मिट गई, लेकिन भारत की निष्ठा आज भी अटल है।
पुनरुत्थान के 75 वर्ष: वर्ष 1951 में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर की पुनर्स्थापना के 75 वर्ष (अमृत काल) पूरे हो रहे हैं।
2. प्रधानमंत्री का विजन और कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में मंदिर के कायाकल्प का नेतृत्व कर रहे हैं, इस उत्सव के मुख्य सहभागी हैं:
72 घंटे का अखंड ओंकार जाप: मंदिर परिसर में निरंतर चल रहा यह जाप राष्ट्र की एकता और सभ्यता की निरंतरता का आध्यात्मिक उद्घोष है।
शौर्य यात्रा (11 जनवरी): प्रधानमंत्री इस प्रतीकात्मक यात्रा का नेतृत्व करेंगे, जो उन अनगिनत बलिदानियों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने सदियों तक सोमनाथ की गरिमा को बचाए रखा।
ड्रोन और लाइट-साउंड शो: आधुनिक तकनीक के माध्यम से सोमनाथ के 1500 वर्षों के इतिहास को श्रद्धालुओं के सामने जीवंत किया जा रहा है।
3. सरदार पटेल का संकल्प और आधुनिक भारत का गौरव
इतिहास गवाह है कि 12 नवंबर 1947 (दीपावली) को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने खंडहरों के बीच खड़े होकर समुद्र के जल को हाथ में लेकर मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया था। उनका मानना था कि सोमनाथ का गौरव बहाल करना भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास को बहाल करने के लिए अनिवार्य है। आज का भव्य 'कैलाश महामेरु प्रसाद' शैली का मंदिर उसी अटूट संकल्प का परिणाम है।
4. मंदिर की भव्यता और जन-आस्था
स्थापत्य: सोमनाथ का शिखर 150 फीट ऊंचा है, जिस पर 10 टन वजनी स्वर्ण कलश स्थापित है। मंदिर परिसर में 1,666 स्वर्ण-मंडित कलश और 14,200 ध्वजाएं श्रद्धालुओं की पीढ़ियों की भक्ति को दर्शाती हैं।
श्रद्धालुओं का सैलाब: सोमनाथ में हर साल 95 लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं। महाशिवरात्रि जैसे पर्वों पर यहाँ आस्था का सागर उमड़ता है, जो दर्शाता है कि आधुनिकता के बीच भी भारत की जड़ें सनातन में गहरी जमी हैं।
5. स्थिरता और महिला सशक्तिकरण: एक आधुनिक रोल मॉडल
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ अब न केवल एक आध्यात्मिक केंद्र है, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय सुधार का भी उदाहरण है:
पर्यावरण संरक्षण: मंदिर के फूलों से जैविक खाद (1,700 बिल्व वृक्षों के लिए) और प्लास्टिक कचरे से पेवर ब्लॉक (Mission LiFE) का निर्माण यहाँ की विशेषता है। 72,000 वर्ग फुट में फैला मियावाकी जंगल सालाना 93,000 किलो कार्बन सोखता है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता: ट्रस्ट के 906 कर्मचारियों में से 363 महिलाएं हैं। प्रसाद वितरण से लेकर बिल्व वन के प्रबंधन तक की कमान महिलाओं के हाथ में है, जो सालाना ₹9 करोड़ की आय के माध्यम से सशक्त हो रही हैं।
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निष्कर्ष: शाश्वत है सोमनाथ
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व दुनिया को यह संदेश देता है कि समय के साथ विनाशकारी ताकतें इतिहास के पन्नों में खो जाती हैं, लेकिन धर्म और सत्य पर आधारित आस्था सदैव जीवित रहती है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने साझा किया, यह वह भूमि है जहाँ मनुष्य आध्यात्मिक पूर्णता और मोक्ष (सिद्धि) को प्राप्त करता है।

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