शाहपुर: स्वागत द्वार की जगह नगर परिषद ने खड़ा किया 'लापरवाही का स्मारक', 16 लाख के पत्थर बने सफेद हाथीShahpur Municipal Council Negligence, Welcome Gate Controversy, Waste of Public Funds
- Feb 12
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वैसे तो पत्थर धूप और बारिश झेलने के लिए ही बने होते हैं, लेकिन जब जनता की गाढ़ी कमाई के 16 लाख रुपये सड़क किनारे पत्थरों की शक्ल में 'लावारिस' पड़े हों, तो सवाल उठना लाजिमी है। नगर परिषद शाहपुर की अदूरदर्शिता का आलम यह है कि जिस बजरंग रोड पर भव्य स्वागत द्वार बनना था, वहां आज परिषद की आपसी खींचतान और प्रशासनिक विफलता की कहानी लिखी जा रही है।

फाइलों में गुम हुआ 'भव्य प्रवेश'
नगर को आकर्षक लुक देने का सपना दिखाकर करीब दो साल पहले लाखों के लाल पत्थर मंगवाए गए थे। योजना थी कि 22 जनवरी 2024 को जब पूरा देश उत्सव मनाएगा, तब शाहपुर भी इस द्वार से अपना स्वागत करेगा। लेकिन उत्सव बीत गया, साल बदल गया, पर नगर परिषद के विवाद नहीं सुलझे। आज ये पत्थर किसी निर्माण का हिस्सा बनने के बजाय बजरंग रोड की धूल फांक रहे हैं।
नियमों को ताक पर रखकर 'शॉपिंग', अब पार्षदों को ऐतराज
चर्चा है कि इन पत्थरों की खरीदी में न तो प्रक्रिया का पालन हुआ और न ही पीआईसी की बैठक में प्रस्ताव लाया गया। बिना तैयारी के की गई इस 'शॉपिंग' का नतीजा यह हुआ कि पार्षदों ने विरोध का झंडा बुलंद कर दिया। नतीजा? काम अधर में लटक गया और सरकारी खजाने को 16 लाख का चूना लग गया।
Shahpur Municipal Council Negligence, Welcome Gate Controversy, Waste of Public Funds
वार्डों में विकास का 'अकाल', स्वागत द्वार पर 'फालतू खर्च'
स्थानीय नागरिकों में इस बात को लेकर गहरा गुस्सा है कि परिषद के पास वार्डों की जर्जर सड़कें ठीक करने और अधूरी नालियां पूरी करने के लिए बजट नहीं है, लेकिन बिना ठोस प्लानिंग के 'शोपीस' प्रोजेक्ट्स पर लाखों बहाने के लिए पैसा मौजूद है। लोगों का कहना है कि पत्थर भले ही न गलें, लेकिन समय के साथ उनकी चमक और परिषद की साख दोनों धूमिल हो रही हैं।
बड़ा सवाल: आखिर किसका था ये शौक?
बिना किसी वर्क ऑर्डर या औपचारिक मंजूरी के इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री मंगाना सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है। अब सवाल यह है कि अगर यह प्रोजेक्ट रद्द होता है, तो इन पत्थरों के परिवहन और बर्बादी का हिसाब कौन देगा? क्या शाहपुर की जनता को स्वागत द्वार की जगह सिर्फ पत्थरों का ढेर ही देखना पड़ेगा?











