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सतपुड़ा के आदिवासियों की धरोहर पर संकट: विकास या विनाश? 16 परिवारों का अस्तित्व दांव पर!TribalHeritage LandRights ForestStruggle

  • Dec 28, 2025
  • 2 min read

Updated: Jan 1


विशेष रिपोर्ट: सतपुड़ा के आदिवासियों की विरासत पर संकट, 16 परिवारों के अस्तित्व की लड़ाई!

बैतूल/नर्मदापुरम सीमा: सतपुड़ा की वादियों में बसे आदिवासियों के हक पर एक बार फिर वन विभाग की कार्यप्रणाली ने सवाल खड़े कर दिए हैं। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से महज 50-60 किमी दूर स्थित ग्राम तारमखेड़ा के 16 आदिवासी परिवार आज अपनी ही पुश्तैनी जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह वही स्थान है जिसे श्रद्धालु 'झोत वाले हनुमान धाम' के नाम से जानते हैं और अपनी गहरी आस्था रखते हैं।

TribalHeritage LandRights ForestStruggle

1962 का रिकॉर्ड, फिर भी न्याय का इंतज़ार

GAMKI MEDIA से विशेष चर्चा के दौरान बुजुर्ग रामप्रसाद ने अपने दर्द को साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज यहां दशकों से रह रहे हैं और खेती कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने प्रमाण देते हुए कहा कि 1962 से राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में उनका लेखा-जोखा मौजूद है। हैरानी की बात यह है कि साल 2016 में पट्टा वितरण की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी ग्रामीणों को मिली थी, लेकिन आरोप है कि तत्कालीन डिप्टी रेंजर द्वारा इस कागजी कार्यवाही को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।आखिर किसके इशारे पर इन आदिवासियों के हक की फाइलों को रोका गया? यह एक बड़ा सवाल है। TribalHeritage LandRights ForestStruggle

दहशत और धमकियों के बीच अटूट हौसला

ग्रामीण भीमराव और दिलीप ने वन विभाग के मैदानी अमले पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें लगातार डराया-धमकाया जाता है ताकि वे जमीन छोड़कर चले जाएं। भय का आलम यह है कि उनका एक साथी संतोष अपनी जमीन छोड़कर शहर में मजदूरी करने पलायन कर गया है।

लेकिन बाकी ग्रामीण अडिग हैं। उन्होंने दो टूक कहा— "चाहे लाठियां चले या कुछ और, हम कानून का उल्लंघन नहीं करेंगे लेकिन कानून के रास्ते पर चलकर अपनी जमीन की रक्षा मरते दम तक करेंगे।"

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प्रशासनिक अनदेखी: विधायक से लेकर अधिकारियों तक गुहार

यह मामला घोड़ाडोंगरी विधायक और जिले के आला अधिकारियों की चौखट तक पहुँच चुका है, लेकिन परिणाम अब तक शून्य रहा है। नर्मदापुरम और बैतूल जिले की सीमा पर स्थित होने के कारण प्रशासन शायद इस संवेदनशील मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रहा है।

GAMKI MEDIA का सवाल:

  1. क्या 1962 के रिकॉर्ड होने के बावजूद आदिवासियों को पट्टों से वंचित रखना अन्याय नहीं है?

  2. क्या वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा ग्रामीणों को डराना-धमकाना कानून सम्मत है?

  3. जनप्रतिनिधि इस गंभीर विस्थापन के मुद्दे पर अब तक मौन क्यों हैं?

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