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बैतूल कांग्रेस का 'दोहरा चेहरा': एक तरफ आक्रामक रणनीति का ढोंग, दूसरी तरफ अपनों की ही लापरवाही से उजड़ते मासूमों के घर PoliticalAccountability, LocalGovernanceFailures, LeadershipResponsibility

  • Mar 22
  • 3 min read

बैतूल/घोड़ाडोंगरी। जिले में कांग्रेस खुद को 'आक्रामक' और 'मजबूत संगठन' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट और बेहद डरावनी है। दानवाखेड़ा गांव में फैली बीमारी और दो मासूमों की मौत ने कांग्रेस के उन दावों की हवा निकाल दी है, जिसमें कार्यकर्ताओं को सम्मान और जनता के मुद्दों को उठाने की बात कही जा रही है।

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राहुल उइके का 'ढाई साल का मौन' और अब फोटो की राजनीति

घोड़ाडोंगरी क्षेत्र के दानवाखेड़ा गांव में जो मातम पसरा है, उसकी जिम्मेदारी से स्थानीय कांग्रेस नेता और जनपद अध्यक्ष राहुल उइके पल्ला नहीं झाड़ सकते। पिछले ढाई वर्षों से सत्ता और संसाधनों की चाबी थामे बैठे उइके आज इसे 'प्रशासनिक विफलता' बता रहे हैं, लेकिन क्षेत्र की जनता उनसे तीखे सवाल पूछ रही है:

  • पद पर रहते हुए सुध क्यों नहीं ली? जनपद अध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद पर होने के बावजूद पिछले 2.5 सालों में उन्होंने इस आदिवासी गांव की बुनियादी सुविधाओं के लिए क्या ठोस कदम उठाए?

  • फंड का क्या हुआ? क्या जनपद के फंड से इस गांव में शुद्ध पेयजल और सड़क के लिए कभी कोई प्रस्ताव भेजा गया था या सिर्फ फाइलों में ही 'विकास' चलता रहा?

  • मीडिया के बाद ही क्यों जागी संवेदना? ग्रामीणों में चर्चा है कि जब तक बच्चे सुरक्षित थे, तब तक कोई कांग्रेसी नेता वहां नहीं पहुंचा। आज जब गांव में मातम है, तो इसे सियासी जमीन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

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संगठन की 'आक्रामकता' सिर्फ कागजों तक सीमित?

एक ओर जिला अध्यक्ष निलय डागा जिले में 'नए तेवर' और 'मजबूत तालमेल' का ढिंढोरा पीट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके ही जिम्मेदार पदाधिकारी अपने क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं। दानवाखेड़ा की घटना यह साबित करती है कि कांग्रेस का यह 'बदला हुआ स्वरूप' सिर्फ चुनावी बिसात बिछाने के लिए है, जनता की सेवा के लिए नहीं।

दिग्विजय सिंह के ट्वीट ने बढ़ाई अपनों की मुश्किलें

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर सरकार को घेरने की कोशिश तो की, लेकिन उनके इस दांव ने खुद स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अगर स्थानीय स्तर पर विपक्ष और वर्तमान जनप्रतिनिधि (राहुल उइके) सजग होते, तो आज प्रशासन को रातों-रात हैंडपंप लगाने की नौबत नहीं आती। संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि स्थानीय कांग्रेसी नेतृत्व की 'इच्छाशक्ति' की कमी थी।


कांग्रेस के 'आक्रामक संगठन' से 5 तीखे सवाल:

दानवाखेड़ा की हृदयविदारक घटना और कांग्रेस की वर्तमान कार्यशैली को देखते हुए, जिले की जनता और राजनीतिक गलियारे अब इन सवालों के जवाब मांग रहे हैं:

  1. ढाई साल का हिसाब कहाँ है? जब पिछले 30 महीनों से घोड़ाडोंगरी क्षेत्र में कांग्रेस समर्थित जनपद अध्यक्ष (राहुल उइके) सत्ता की चाबी थामे बैठे हैं, तो उन्होंने इस आदिवासी बहुल गांव में शुद्ध पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अपने विशेष फंड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया?

  2. क्या 'आक्रामकता' सिर्फ फोटो और सोशल मीडिया तक है? जिला अध्यक्ष निलय डागा जिस 'नई ऊर्जा' और 'जमीनी संगठन' की बात कर रहे हैं, क्या वह संगठन दानवाखेड़ा के मासूमों की चीखें सुनने में नाकाम रहा? क्या कांग्रेस का काम सिर्फ मौत के बाद 'फोटो पॉलिटिक्स' करना रह गया है?

  3. पदों की रेवड़ी या जनता की सेवा? भैंसदेही और घोड़ाडोंगरी में ब्लॉक अध्यक्षों की जो नई फौज खड़ी की गई है, क्या उनका काम सिर्फ गुटबाजी खत्म करना है या अपने क्षेत्रों में व्याप्त कुपोषण और बीमारी जैसी मूलभूत समस्याओं को प्रशासन के सामने मजबूती से रखना भी है?

  4. दिग्विजय सिंह को गुमराह क्यों किया गया? पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से ट्वीट करवाकर सरकार को घेरने की कोशिश की गई, लेकिन क्या उन्हें यह बताया गया कि इस क्षेत्र के स्थानीय जनप्रतिनिधि (जनपद अध्यक्ष) खुद कांग्रेस के हैं और पिछले ढाई साल से इस समस्या पर 'मौन' साधे बैठे थे?

  5. निष्ठा का मापदंड क्या है? कांग्रेस दावा कर रही है कि 'निष्ठावान' कार्यकर्ताओं को आगे लाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या जनता के प्रति जवाबदेही भी इस निष्ठा का हिस्सा है, या सिर्फ बड़े नेताओं की परिक्रमा करना ही संगठन में पद पाने की योग्यता है?

निष्कर्ष: बैतूल कांग्रेस को यह समझना होगा कि संगठन की ताकत सिर्फ कागजी नियुक्तियों और आक्रामक बयानों से नहीं, बल्कि जनता के बीच उनकी मौजूदगी और सेवा से आंकी जाती है। दानवाखेड़ा की घटना ने कांग्रेस के 'मजबूत संगठन' के दावों की कलई खोल दी है।

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