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बस्तर में 'पर्यावरण की बलि' और बच्चों को 'समर कैंप' का लॉलीपॉप; NMDC और सरकार की दोहरी नीति पर उठे सवाल EnvironmentalJustice, MiningImpact, IndigenousRights

  • May 27
  • 3 min read

OPINION:दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा जिले से सरकारी ढिंढोरा पीटने वाली एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने क्षेत्र के आदिवासियों और पर्यावरणविदों को हैरान कर दिया है। एक तरफ जहां बस्तर के जंगलों को उजाड़ने, पहाड़ों को खोदने और पर्यावरण की सरेआम हत्या करने के आरोप झेल रही नवरत्न कंपनी NMDC (राष्ट्रीय खनिज विकास निगम) ने 17 गांवों में आदिवासी बच्चों के लिए 'समर कैंप' शुरू किया है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता इसे सरकार की "जख्म देकर मरहम लगाने" वाली नीति करार दे रही है।

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प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, NMDC ने 20 मई से 15 जून 2026 तक 1700 आदिवासी बच्चों को जोड़ने के दावे के साथ इस कैंप की शुरुआत की है, जिसमें क्राफ्टवर्क, म्यूजिक और खेलकूद (कबड्डी, खो-खो) जैसी गतिविधियां शामिल हैं। लेकिन बस्तर के जागरूक नागरिक पूछ रहे हैं कि—जिस बस्तर की प्राकृतिक पहचान और शुद्ध आबोहवा को खनन (Mining) की भेंट चढ़ा दिया गया, वहां कुछ घंटों का खेलकूद क्या बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर पाएगा?

दंतेवाड़ा के 'सत्य' और दावों में बड़ा अंतर

NMDC ने अपनी रिपोर्ट में खुद स्वीकार किया है कि फिलहाल गांवों में बच्चों की उपस्थिति महज 30 से 40 ही है और संख्या बढ़ाने के लिए 'मोबिलाइजेशन' (दबाव या समझाइश) का सहारा लिया जा रहा है।

स्थानीय जानकारों का कहना है कि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी परिवारों के बच्चे इन समर कैंपों से दूरी बना रहे हैं, क्योंकि वे अपनी आंखों के सामने अपने पुरखों के पहाड़ों (जैसे बैलाडीला) और जंगलों को तबाह होते देख रहे हैं।

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बस्तर में कैसे हुई 'पर्यावरण की हत्या'?

NMDC और सरकार चाहे जितने भी कल्याणकारी दावे कर लें, लेकिन बस्तर के जमीनी साक्ष्य और पर्यावरण को पहुंचे नुकसान की हकीकत को छुपाया नहीं जा सकता। खनन के कारण बस्तर की जीवनदायिनी शंखिनी और डंकिनी नदियां सालों से लाल पानी (माइनिंग वेस्ट) उगल रही हैं, जिससे दर्जनों गांवों की कृषि और स्वास्थ्य पूरी तरह तबाह हो चुका है।

  • बैलाडीला की खदानों से निकला 'माइनिंग वेस्ट' (Iron Ore Fines और टेलिंग्स) शंखिनी और डंकिनी नदियों में मिलता है। सालों से इस मलबे के कारण इन नदियों का पानी गहरे लाल रंग का हो गया है।

  • नदियों का यह प्रदूषित पानी और खदानों से उड़ने वाली धूल गांवों के खेतों में जमा हो जाती है। इससे कई क्षेत्रों में धान और अन्य फसलों की उपज आधी से भी कम रह गई है और हजारों एकड़ जमीन बंजर होने की कगार पर है।

  • माइनिंग वेस्ट से दूषित पानी पीने और उपयोग करने से स्थानीय आदिवासी आबादी को त्वचा और पेट संबंधी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। पीने के साफ पानी का संकट क्षेत्र के निवासियों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

  •  बढ़ते पर्यावरणीय संकट और स्थानीय विरोध के कारण, दंतेवाड़ा जिला प्रशासन ने नियमों के उल्लंघन पर एनएमडीसी (NMDC) पर ₹1,620.5 करोड़ का भारी जुर्माना भी लगाया था।

एनजीओ के सहारे 'छवि चमकाने' की कोशिश?

NMDC ने इस काम के लिए 'WOSCA' नामक संस्था को पार्टनर बनाया है। आलोचकों का आरोप है कि कॉरपोरेट कंपनियां अपनी सीएसआर (CSR) गतिविधियों के जरिए केवल अपनी छवि को चमकाने (Greenwashing) का प्रयास करती हैं। जिस ग्रामीण समुदाय में बुनियादी स्वास्थ्य और स्वच्छ पेयजल की भारी कमी हो, वहां समर कैंप जैसी योजनाएं केवल कागजी खानापूर्ति और मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने का जरिया मात्र लगती हैं।

सरकार और एनएमडीसी को यह समझना होगा कि बस्तर के बच्चों को सिर्फ 4 घंटे के समर कैंप या बिस्कुट-पेस्ट्री की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें एक सुरक्षित पर्यावरण, उनके संवैधानिक अधिकार (पेसा कानून) और उनके जंगलों का संरक्षण चाहिए। जब तक खनन के नाम पर बस्तर की प्राकृतिक संपदा को लूटा जाएगा, तब तक ऐसे आयोजन केवल एक छलावा ही रहेंगे।

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