सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की बड़ी दलील: 'PIL की अवधारणा खत्म करने का समय आ गया', कोर्ट ने कहा- हम सावधानी बरतते हैं JudicialProcesses, PublicInterestLitigation, SupremeCourtDebate
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नई दिल्ली | 09 अप्रैल, 2026
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने एक बेहद अहम और विवादास्पद सुझाव दिया है। केंद्र ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि जनहित याचिका (PIL) को एक कानूनी अवधारणा के रूप में समाप्त करने पर विचार किया जाए। सरकार का तर्क है कि जिस उद्देश्य के लिए PIL की शुरुआत की गई थी, वह अब अप्रासंगिक हो चुका है और यह 'एजेंडा-आधारित मुकदमेबाजी' का जरिया बन गई है।

'PIL कल्चर' पर केंद्र के कड़े प्रहार
9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष दलील देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि PIL का जन्म एक 'असाधारण संवैधानिक व्यवस्था' के रूप में हुआ था ताकि उन लोगों को न्याय मिल सके जो गरीबी, निरक्षरता या सामाजिक अलगाव के कारण अदालत नहीं पहुँच सकते।
केंद्र की दलीलों के मुख्य बिंदु:
अप्रासंगिक उद्देश्य: सरकार के अनुसार, 1980 के दशक की स्थितियां अब बदल चुकी हैं। साक्षरता में वृद्धि, ई-कोर्ट तकनीक और कानूनी सहायता (NALSA) के मजबूत ढांचे ने न्याय तक पहुंच को सुलभ बना दिया है।
दस्तावेजों का अंबार (Docket Expansion): डेटा पेश करते हुए बताया गया कि 1985 में सालाना लगभग 25,000 PIL फाइल होती थीं, जो 2019 तक बढ़कर 70,000 से अधिक हो गई हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा 'निहित स्वार्थों' से प्रेरित होता है।
लोकलुभावन राजनीति: मेहता ने तर्क दिया कि PIL अब अक्सर राजनीतिक या व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वियों के इशारे पर 'प्रसिद्धि' पाने के लिए दायर की जाती हैं।
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सबरीमाला मामला: 'गैर-श्रद्धालु' याचिकाकर्ताओं पर सवाल
यह बहस तब शुरू हुई जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने सवाल किया कि उन लोगों की याचिकाओं को क्यों स्वीकार किया गया जो संबंधित धर्म के अनुयायी या श्रद्धालु नहीं हैं।
केंद्र ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सबरीमाला मामला इसका सटीक उदाहरण है। सरकार के अनुसार, यह याचिका उन लोगों द्वारा दायर की गई जिनका इस परंपरा से कोई व्यक्तिगत लेना-देना नहीं था। जस्टिस इंदु मल्होत्रा के 2018 के असहमतिपूर्ण फैसले (Dissenting Verdict) का हवाला देते हुए केंद्र ने कहा कि धार्मिक मामलों में PIL की अनुमति देने से बाहरी हस्तक्षेप के द्वार खुल जाते हैं।
क्या होती है जनहित याचिका (PIL)? एक संक्षिप्त परिचय
सरल शब्दों में कहें तो PIL (Public Interest Litigation) एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिसमें कोई भी व्यक्ति या संस्था समाज के किसी बड़े वर्ग के हित के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है।
बिंदु | पारंपरिक कानून (Locus Standi) | जनहित याचिका (PIL) |
कौन जा सकता है? | केवल वही व्यक्ति जिसके अधिकारों का हनन हुआ हो। | समाज का कोई भी जागरूक नागरिक या संस्था। |
उद्देश्य | व्यक्तिगत राहत प्राप्त करना। | सार्वजनिक हित, मानवाधिकार या पर्यावरण की रक्षा। |
शुरुआत | यह दशकों से चली आ रही व्यवस्था है। | भारत में 1981 के S.P. Gupta vs Union of India मामले से मजबूत हुई। |
लतिका स्टैंडी (Locus Standi) का नियम: सामान्य कानून कहता है कि कोर्ट वही जा सकता है जो पीड़ित हो। PIL ने इस नियम को शिथिल (Relax) कर दिया था ताकि गरीबों और असहायों की ओर से कोई और न्याय मांग सके। अब केंद्र इसी 'लतिका स्टैंडी' के पुराने नियम को पूरी तरह बहाल करने की मांग कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: "हम सावधानी बरतते हैं"
सरकार की इन दलीलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह PIL स्वीकार करते समय अत्यधिक सावधानी बरतता है। कोर्ट यह सुनिश्चित करता है कि याचिका के पीछे कोई वास्तविक सार्वजनिक मुद्दा हो, न कि कोई व्यक्तिगत एजेंडा। हालांकि, पीठ अब इस कानूनी सवाल पर विचार कर रही है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति धार्मिक परंपराओं को चुनौती दे सकता है जो उस धर्म का हिस्सा नहीं है।
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