भारत-अमेरिका ट्रेड डील: भारतीय कृषि के लिए नए द्वार या कड़े मानकों की चुनौती?IndiaUSTrade, EconomicImpact, AgriculturePolicy
- Feb 9
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नई दिल्ली | 09 फरवरी 2026 (COURTESY PIB)
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुआ व्यापारिक समझौता (Trade Deal) देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में है। जहाँ केंद्र सरकार इसे 'ऐतिहासिक और अभूतपूर्व' करार दे रही है, वहीं आर्थिक विशेषज्ञ और विपक्षी खेमा इसके कार्यान्वयन और भविष्य के प्रभावों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।

सरकारी पक्ष: 'डिप्लोमेसी, डेवलपमेंट और डिग्निटी' का संगम
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस समझौते को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर बताया है। भोपाल में आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने डील के मुख्य फायदों को रेखांकित किया:
शून्य शुल्क का लाभ: अमेरिका ने भारतीय मसालों, चाय, कॉफी, काजू और ताजे फलों (आम, पपीता, अनानास आदि) पर आयात शुल्क को घटाकर शून्य कर दिया है। इससे वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
सुरक्षात्मक रुख (Protective Policy): भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों जैसे डेयरी, गेहूं, चावल, चीनी और मक्का को इस समझौते से पूरी तरह बाहर रखा है। इन उत्पादों पर अमेरिका को कोई टैरिफ छूट नहीं दी गई है, ताकि घरेलू किसानों के हितों की रक्षा की जा सके।
क्षेत्रीय विकास: टेक्सटाइल सेक्टर में शुल्क में 18% की कटौती की गई है, जिससे कपास उत्पादक किसानों और एमएसएमई (MSME) क्षेत्र को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
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चुनौतियों का विश्लेषण: क्या राह इतनी आसान है?
यद्यपि कागजों पर यह समझौता भारत के पक्ष में भारी दिखता है, लेकिन धरातल पर कई ऐसी चुनौतियाँ हैं जो इस 'ऐतिहासिक डील' की सफलता को सीमित कर सकती हैं:
1. गैर-टैरिफ बाधाएं (Non-Tariff Barriers)
अमेरिका में शुल्क तो शून्य हो गया है, लेकिन वहाँ के SPS (Sanitary and Phytosanitary) मानक अत्यंत कड़े हैं। पूर्व में भी कीटनाशकों के स्तर (Pesticide residue) के कारण भारत की कई खेपें वापस भेजी जा चुकी हैं। बिना अत्याधुनिक लैब और गुणवत्ता सुधार के, शून्य शुल्क का लाभ उठाना किसानों के लिए कठिन होगा।
2. 'Reciprocity' या बदले में रियायत का दबाव
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 'कुछ भी मुफ्त नहीं होता'। विशेषज्ञों का सवाल है कि यदि भारत ने कृषि उत्पादों पर अमेरिका को पहुँच नहीं दी है, तो अमेरिका ने इतनी बड़ी रियायत क्यों दी? क्या भविष्य में भारत को ई-कॉमर्स, डिजिटल डेटा या बौद्धिक संपदा (IPR) जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों को बड़ी छूट देनी पड़ेगी?
3. लॉजिस्टिक्स और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
भले ही टैक्स कम हो जाए, लेकिन भारत से अमेरिका तक माल भेजने की लागत (Logistics Cost) अभी भी वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों की तुलना में अधिक है। बुनियादी ढांचे में सुधार के बिना केवल नीतिगत बदलाव पर्याप्त नहीं होंगे।
4. छोटे किसानों की जागरूकता
इस डील का लाभ बड़े निर्यातकों तक सीमित रहने का खतरा है। छोटे और सीमांत किसानों तक इस बाजार की पहुँच बनाने के लिए सरकार को 'फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन्स' (FPOs) को और अधिक सशक्त करना होगा।
निष्कर्ष
भारत-अमेरिका ट्रेड डील निश्चित रूप से भारतीय कृषि-निर्यात को एक नई ऊंचाई देने की क्षमता रखती है। सरकार का 'कमिटमेंट, कॉम्प्रोमाइज नहीं' का नारा राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा का आश्वासन देता है। हालांकि, इस समझौते की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपनी गुणवत्ता नियंत्रण प्रणालियों को कितनी जल्दी अमेरिकी मानकों के अनुरूप ढाल पाता है।









