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भारतीय जनसंघ से भाजपा तकः वैचारिक संघर्ष और सफलता की यात्रा

  • Apr 6
  • 7 min read

भोपाल: भारत में लोकतांत्रिक राजनैतिक दलों की चर्चा करें तो भारतीय राजनीति में विचारधारा की जब बात आती हैं स्वतंत्रता के पश्चात् उभरे राजनैतिक परिदृश्य के संबंध में अधिकांश राजनैतिक दल भारतीय राजनीति में स्थापित होने के लिये राष्ट्रीय हित के वैचारिक आधार का त्याग कर तुष्टिकरण एवं जातिवादी व्यवस्था की राजनीति कर रहे थें। भारतीय राजनीति में विचार गौण था केवल सर्वोपरि था स्वाधीन भारत में राजनैतिक रुप से स्थापित होने का विचार।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो दल राजनैतिक रुप से सक्रिय थे वह केवल तुष्टिकरण की राजनीति कर रहे थे। कम्युनिष्ठ एवं कांग्रेसी तुष्टिकरण की वकालत कर रहे थें जिसके कारण भारत की एकता एवं अखंडता के समक्ष संकट उत्पन्न होने लगे थे। तुष्टिकरण एवं जातिवादी राजनीति के कारण भारत में दो विधान एव दो प्रधान की चर्चा होने के कारण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समक्ष चुनौती उत्पन्न होने से कांग्रेस से मुखर विरोध कर प्रखर राष्ट्रवादी नेता श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने दो विधान एव दो प्रधान का विरोध किया कि भारत में दो प्रधान एवं दो विधान नहीं चलेगें। नेहरु लियाकत समझौते से आहत होकर डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को आत्मसात कर भारतीय दर्शन एवं चिंतन के अनुरुप राष्ट्र प्रथम की भावना के लिये कार्य करने के लिये 21 अक्टुबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना कर राष्ट्रवादी विचार के लिये कार्य करने लिये नवीन राजनैतिक दल का गठन किया था।


नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के बाद डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में 21 अक्टुबर 1951 को गठित हुये भारतीय जनसंघ ने स्थापना के बाद 1952 में हुये आम चुनाव में "दीपक" चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा तब देशभर से जनसंघ के 03 सांसद चुनाव में विजयश्री प्राप्त कर संसद भवन पहुँचे थे। संसद भवन में डॉ मुखर्जी के नेतृत्व में 38 सांसदों में मिलकर नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट का गठन किया डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी एनडीएफ के नेता प्रतिपक्ष बनें।


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिये नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के बाद बनाये गये नये राजनैतिक दल भारतीय जनसंध ने अपने गठन के प्रारंभसे राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर राष्ट्र से जुड़े हुये मुददो को लेकर

राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ किये उसमें प्रमुख रुप से कश्मीर आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन, नेहरु-नून समझौते का विरोध, चीन द्वारा भारत के भू-भाग पर अतिक्रमण एवं तिब्बत की मुक्ति के लिये आंदोलन, शिमला समझौता एवं 1975 मे इंदिरा गाँधी के द्वारा देश के उपर थोपे गये आपातकाल का भारतीय जनसंघ के नेताओं ने पुरजोर विरोध करते हुये राष्ट्रीय आंदोलन किये थे। कश्मीर आंदोलन में राष्ट्रवाद की अलख जगाते हुये डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान हुआ हम आज भी नारा लगाते हैं जहाँ हुये बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा हैं।


भारतीय राजनीति में सत्तर के दशक में महत्वपूर्ण परिवर्तन का दौर रहा। आपातकाल ने देश की राजनीति में नया मोड़ लेकर आया सत्ता के विरोध में उठ रहे स्वर को दबाने के लिये तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 25 जनू 1975 को संविधान की धारा 352 के तहत देश में आपातकाल लागू कर विपक्ष के बड़े नेताओं को मीसा एक्ट (MAINTENENCE OF INTERNAL SECUARITY ACT) के तहत जेल में बंद कर दिया था।


देश में थोपे गये आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देशव्यापी आंदोलन प्रांरभ किये गये इन आंदोलनों के परिणामस्वरुप जयप्रकाश नारायण के आवहान पर विपक्षी दलों ने 1977 में मिलकर चुनाव लड़ा। आम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई जनता पार्टी बहुमत लेकर सत्ता में 1 मई 1977 को भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया। जनता पार्टी में विलय के पश्चात् कुछ नेताओं ने दोहरी सदस्यता का विषय उठाकर जनसंघ के नेताओं पर निशाना साधा जिसके कारण जनता पार्टी में जनसंघ के नेताओं को असहजता होने पर जनसंघ के नेताओं में जनता पार्टी से स्वंय को अलग कर लिया।


जनसंघ के नेताओं ने जनता पार्टी से स्वंय को अलग कर भारतीय राजनीति में स्वंय के लिये नये अध्याय का आरंभ कर भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा पर नये राजनीतिक दल के रुप में 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा पर राजनीतिक दल का गठन किया। 1980 में भारतीय राजनीति में बने नये राष्ट्रीय दल भारतीय जनता पार्टी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में श्रेष्ठ विचारक पंडित अटलबिहारी जी वाजपेयी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें जिनके नेतृत्व में भाजपा ने लोकतांत्रिक मूल्यों एवं समावेशी राजनीति को आगे बढ़ाया।


भारतीय जनता पार्टी के गठन के प्रारंभिक दौर में भाजपा को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सन् 1984 में हुये आम चुनाव में भाजपा को लोकसभा में केवल 02 सीटों पर ही विजय प्राप्त हुई। लेकिन पार्टी के कार्यकर्ता विचारधारा को आगे बढ़ाते हुये कांग्रेस के भृष्टाचार के खिलाफ सड़को पर संघर्ष कर रहे थे जिसके परिणाम स्वरुप 1989 में हुये चुनाव में बोफोर्स घोटाला एव भृष्टाचार के मुददें पर कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। वी.पी. सिंह की सरकार बनी जिसे भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। इसी दौर मे भाजपा ने राममंदिर निर्माण के विषय को लेकर आडवाणीजी के नेतृत्व में सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक राम रथयात्रा निकाली रथयात्रा को रोके जाने से भाजपा ने वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार से समर्थन वापस लेकर भाजपा ने विचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को प्रमाणित किया कि हम विचार के लिये राजनैतिक क्षेत्र में कार्य कर रहे है सत्ता मे सहभागिता एवं सरकार में बना रहना हमारा लक्ष्य नही हैं। सरकार से समर्थन लेने के कारण भाजपा वैचारिक रुप से और अधिक मजबूत होकर अपने विचार के साथ आगे बढ़ने लगी। राम जन्मभूमि आंदोलन से पार्टी को व्यापक जनसमर्थन दिलाया।


अटल बिहारी वाजपेयी एवं लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा मजूबत हुई। अटल आडवाणी युग में सन् 1996 में हूये आम चुनाव में भाजपा को लोकसभा में 161 सीट प्राप्त हुई और अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने लेकिन बहुमत नही होने से सरकार केवल 13 दिन ही चली। 1998 में हुये मध्यावधि चुनाव में भाजपा ने 182 सीटों पर विजय प्राप्त कि और सबसे बड़े दल के रुप में एन.डी.ए. की सरकार 13 महिने चली । एन.डी.ए. की सरकार बनने पर भाजपा के नेतृत्व में महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को मजबूत किया था।


1998 में सरकार के द्वारा पोखरण में परमाणु परीक्षण कर विश्व को भारत की सामरिक क्षमता एवं आंतरिक सुरक्षा का अहसास कराया था। इसी दौरान भारत के ग्रामीण परिवेश को सड़को से जोड़कर यातायात को सुगम बनाने की दिशा में कार्य किये गये तथा दूरसंचार एवं आर्थिक सुधारो की दिशा में प्रभावी कार्य किये गये। जयललिता के समर्थन वापस लेने के कारण 1 वोट से अटलजी की सरकार गिर जाने से पूनः सन् 1999 में लोकसभा चुनाव हुये जिसमें भाजपा ने फिर 182 सीट जीती तथा एन.डी.ए. को 306 सीट अटलबिहारी वाजपेयी फिर एक बार प्रधानमंत्री बनें।


सन् 2004 में आम चुनाव में भाजपा के हाथ से सरकार निकल गई जिसके कारण भाजपा 2014 तक विपक्ष में रही। विपक्ष में रहने के दौरान भाजपा ने अपने संगठन तंत्र को वैचारिक रुप से और अधिक मजबूत कर अपने जनाधार को बढ़ाने का कार्य किया। मुखर्जी के सपने एवं अटलजी के अटल इरादों के साथ भाजपा मजबूत विपक्ष के रुप में अपनी भूमिका का निर्वहन करती रही थी। सन् 2004 से 2014 तक विपक्ष में रहते हुये भाजपा ने भ्रष्टाचार, घोटाले, वोटबैंक की राजनीति, एवं मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण संसद भवन से लेकर सड़क तक आंदोलन कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की नीतियों एवं सरकार की कमियों को उजागर कर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिये जन आदोलन किये और उसी का परिणाम निकला 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की केन्द्र से विदाई हुई।


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं देश प्रथम के साथ सन् 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने फिर इतिहास रचा और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई 26 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के रुप में शपथ लेकर पंडित दिनदयालजी उपाध्याय के एकात्म मानववाद को आत्मसात कर अंतिम व्यक्ति के उत्थान एवं विकास की दिशा मे कार्य करना प्रारंभ किया। नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में सबका साथ, सबका विकास सबका विश्वास के नारे से भारत को विश्वगुरु बनाने की संकल्पना को साकार करने का कार्य किया हैं। मोदीजी के नेतृत्व में भाजपा ने 2019, एवं 2023 के लोकसभा चुनावों में भी विजयश्री प्राप्त कि और एन.डी.ए की सरकार ना केवल केन्द्र में बनी बल्कि कही चुनावी राज्यों में भाजपा एवं गठबंधन सरकारें बनी।


सन् 2014 से लगातार मोदीजी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा कि गई भूलों को सुधारने का कार्य किया हैं। भाजपा ने लोकआस्था के विषय हिन्दुओं के आराध्य भगवान मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम के जन्मस्थान पर 500 वर्षों के इंतजार को समाप्त कर अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर रामलला को मंदिर में विराजमान करने का कार्य किया हैं। भारत के मुकुटमणी कश्मीर को भारत के भू-भाग से दूर करने वाले विधान धारा 370 को निरस्त कर कश्मीर को आंतक मुक्त करने की दिशा में काम किया हैं। मुस्लिम महिलाऐं सम्मान जनक जीवन यापन कर सके इसके लिये 3 तलाक की कुप्रथा को समाप्त कर महिलाओ को अभिशाप से मुक्त कर तीन तलाक के मुददें को सफलतापूर्वक स्थापित करने में भाजपा ने सफलता प्राप्त की हैं।


सन् 2014 के बाद से सत्ता में आने के बाद भाजपा ने हर क्षेत्र में कार्य किया हैं। जहाँ एक ओर धारा 370 को हटाने का काम किया तो दुसरी ओर नागरिकता संशोधन अधिनियम, डिजिटल इंडिया, मेकइन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, जनधन योजना, आर्थिक विकास, सुशासन एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की हैं। सीमापार से हो रहे आंतकी हमलों का मुहतोड़ जबाब देने के लिये सर्जिकल स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर, के माध्यम से सीमापार चल रहे आंतक के ठिकानों को नेस्तानाबूद किया हैं तो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती बने हुये लाल आंतक को संकल्प की सिद्धि से समाप्त कर देश को नक्सल मुक्त घोषित करना राष्ट्रवाद के प्रति भाजपा की वैचारिक प्रतिबद्धता को दर्शाता हैं।


विश्व मंच पर भारत की जो छवि बनी हुई थी उस छवि से बाहर निकालकर भारत की एक मजबूत राष्ट्र की छवि बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाना, अंतरिक्ष एवं विज्ञान व प्रौधोगिकी की दिशा में महत्वपुर्ण अभियानों को सफलतापूर्वक पूर्ण करना, भारत की अश्मिता को चुनौती देनेवाले प्रतिक चिन्हों को हटाने तथा वैश्विक महामारी कौविड-19 जैसे महामारी में भारत का सफलता से आर्थिक मंदी के दौर से निकालकर ले जाना तथा वैश्विक महामारी मे विश्व के कही देशों को दवा एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करने के कारण आज विश्व में भारत की स्वीकार्यता बढ़ी हैं। सन् 2014 में मिली निर्णायक जीत के बाद से भारतीय राजनीति में भाजपा की पंचनिष्ठा के आधार पर उसके वैचारिक संघर्ष के सफर को दर्शाता हैं। भाजपा की लगातार जीत सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक विकास, विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता के कारण ही आज भाजपा विश्व की सबसे बड़ी अनुशासित राजनैतिक दल के रुप में कार्य कर रही हैं।


लेखक

निलेश कौशल अधिवक्ता

प्रदेश प्रशिक्षण प्रभारी

भारतीय जनता पार्टी पिछड़ा वर्ग मोर्चा मध्यप्रदेश मो.न.9977883570

 
 

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