जगमूर्ति सेतु अवैध बसूली और भ्रस्टाचार का मामला: पूर्व सैनिक और कांट्रैक्टर सुपरवाइजर शिवदत्त डोंगरे के बयानों को HOP ने नकारा!extortion and corruption case, HOP rejects statements, made by ex-service
पुनासा / नर्मदानगर (खंडवा, मध्य प्रदेश)
एनएचडीसी के पुनासा स्थित जगमूर्ति सेतु पर 20 टन क्षमता के विपरीत 40 से 50 टन वजनी डंपरों को गुजारने और अवैध वसूली के मामले में नई परतें खुलने लगी हैं। मामले में सुरक्षा प्रभारी के तौर पर सामने आए शिवदत्त डोंगरे को लेकर यह जानकारी सामने आई है कि वे भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जवान (पूर्व सैनिक) हैं और सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे निजी कांट्रैक्टर के सुपरवाइजर के रूप में पदस्थ हैं।
निजी एजेंसी के सुपरवाइजर द्वारा एनएचडीसी के शीर्ष पद (HOP) को लेकर दिए गए विवादास्पद बयान के बाद परियोजना प्रमुख ने स्थिति स्पष्ट की है।

extortion and corruption case, HOP rejects statements, made by ex-serviceman !
HOP अजीत कुमार सिंह का पक्ष: एनएचडीसी के परियोजना प्रमुख (HOP) अजीत कुमार सिंह ने मामले पर रुख साफ करते हुए कहा:
मीडिया में मामला उजागर होते ही सुरक्षा का ठेका संभाल रही एजेंसी/कांट्रैक्टर को निर्देश देकर दोनों आरोपी गार्ड्स को तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।
कांट्रैक्टर सुपरवाइजर शिवदत्त डोंगरे द्वारा एचओपी को ब्लैकमेल किए जाने के दावे पर अजीत कुमार सिंह ने कहा कि यह पूरी तरह गलत और बेबुनियाद है। उन्होंने अपने स्तर पर यह बात कही होगी, जिसमें कोई सच्चाई नहीं है।
रिश्वतखोरी और नियमों की खुली अनदेखी पर कानूनी कार्रवाई के सवाल पर एचओपी ने बताया कि इस संबंध में पुनर्वास महानिदेशालय (DGR) को विस्तृत रिपोर्ट भेजी गई है। आगे की नियमानुसार कार्रवाई डीजीआर के स्तर से ही तय की जाएगी।
DGR के तहत सुरक्षा व्यवस्था और सुपरवाइजर की भूमिका :एनएचडीसी के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और जगमूर्ति सेतु की सुरक्षा का ताना-बाना रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्यरत पुनर्वास महानिदेशालय (DGR) के नियमों के तहत बुना जाता है:
डीजीआर द्वारा अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से भूतपूर्व सैनिकों को सुपरवाइजर और गार्ड के रूप में तैनात किया जाता है, ताकि राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा सैन्य अनुशासन और पारदर्शिता के साथ हो सके।
हालांकि, एक पूर्व सैनिक और कांट्रैक्टर के सुपरवाइजर के अधीन तैनात गार्ड्स द्वारा खुलेआम ओवरलोड वाहनों से अवैध वसूली का चलना और फिर सुपरवाइजर द्वारा प्रबंधन को लेकर मनगढ़ंत बयानबाजी करना, डीजीआर व्यवस्था और एजेंसी की आंतरिक निगरानी पर सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय होना बाकी: एक निजी कांट्रैक्टर के सुपरवाइजर द्वारा उच्चाधिकारी के नाम पर दिए गए बयान से यह साफ है कि सुरक्षा तंत्र में तालमेल और अनुशासन का अभाव था। अब सवाल यह उठता है कि क्या केवल गार्ड्स को हटाकर और रिपोर्ट डीजीआर को भेजकर इस गंभीर भ्रष्टाचार की फाइल बंद हो जाएगी, या फिर पुल को नुकसान पहुंचाने वाले इस पूरे ओवरलोडिंग सिंडिकेट पर स्थानीय पुलिस प्रशासन भी कोई सख्त कानूनी कदम उठाएगा?











