गणतंत्र दिवस विशेष: बैसाखियों के सहारे बदली स्कूलों की सूरत, प्रेरणा बने प्रधानाचार्य पंकज वया EducationalReform, InspiringLeadership, CommunityDevelopment
- Jan 25
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भींडर। गणतंत्र दिवस का पर्व हमें राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्यों की याद दिलाता है। ऐसे में भींडर निवासी प्रधानाचार्य पंकज वया का नाम गौरव के साथ लिया जाता है। शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के बावजूद, वया ने अपने फौलादी हौसलों से सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलकर यह साबित कर दिया है कि यदि जज्बा सच्चा हो, तो कोई भी बाधा मार्ग नहीं रोक सकती।

जहाँ भी दी सेवाएं, वहीं छोड़ी अमिट छाप
अपनी 21 वर्षों की राजकीय सेवा के दौरान, पंकज वया ने जिस भी विद्यालय में कदम रखा, उसे निजी स्कूलों की सुविधाओं से टक्कर लेने लायक बना दिया। भींडर, बड़गांव, बांसड़ा, अमरपुरा और अब कुण्डई—इन पांचों स्थानों पर उनके कार्यों की गूंज सुनाई देती है।
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विकास का सफर: मठ से बड़गांव तक
मठ (भींडर): यहाँ विद्यालय भवन और जमीन के लिए जनसहयोग जुटाने की ऐतिहासिक पहल की।
धारता: वरिष्ठ अध्यापक रहते हुए न केवल इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा, बल्कि 100% बोर्ड परिणाम भी सुनिश्चित किया।
अमरपुरा (जागीर): भामाशाहों के सहयोग से सरस्वती मंदिर की स्थापना और स्कूल का सौंदर्यीकरण करवाया।
बांसड़ा: महज एक वर्ष के कार्यकाल में स्टेज निर्माण, खेल मैदान और भव्य प्रवेश द्वार बनवाकर सबको चौंका दिया।
बड़गांव: यहाँ कंप्यूटर लैब, जल मंदिर और बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूल की तर्ज पर यूनिफॉर्म, टाई-बेल्ट जैसे नवाचार किए।
कुण्डई: 10 साल से अधूरा सपना 7 कमरों में बदला
वर्तमान में कुण्डई के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में कार्यरत वया ने यहाँ आकर असंभव को संभव कर दिखाया। विद्यालय वर्षों से मात्र 4 कमरों में चल रहा था, जबकि 10 साल से आवंटित 8 बीघा जमीन पर किसी ने काम नहीं शुरू किया।
पंकज वया ने पहल करते हुए स्वयं 21,000 रुपये दान किए, जिससे प्रेरित होकर स्टाफ ने भी सहयोग किया। अंततः 8.60 लाख रुपये जुटाकर नए परिसर में स्कूल शिफ्ट किया। आज भामाशाहों के सहयोग से यहाँ 40 लाख रुपये की लागत से 7 कमरे, स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर लैब और बाउंड्री वॉल बनकर तैयार हैं।
सिर्फ भवन नहीं, शिक्षा में भी अव्वल
भवन निर्माण के साथ-साथ वया के नेतृत्व में कुण्डई विद्यालय पिछले 8 सालों से लगातार 100% बोर्ड परिणाम दे रहा है। वर्तमान में वे यहाँ सरस्वती मंदिर की स्थापना और बच्चों के लिए आधुनिक खेल सामग्री जुटाने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।
"शारीरिक अक्षमता कभी भी विकास की राह में रोड़ा नहीं बनी। समाज और भामाशाहों का साथ मिले तो सरकारी स्कूलों को भी आदर्श बनाया जा सकता है।" — पंकज वया, प्रधानाचार्य











