top of page

जमीनी हकीकत से दूर 'सरकारी उत्सव': एक तरफ कट रहे जंगल, दूसरी तरफ पीठ थपथपा रही सरकार DeforestationImpact, DevelopmentVsForests, BiodiversityPolicies

  • May 22
  • 3 min read

एक तरफ देश में विकास के नाम पर हर साल लाखों पेड़ और घने जंगल काटे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों और राष्ट्रीय समारोहों में 'जैव विविधता संरक्षण' का उत्सव मनाकर अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है। भोपाल के भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (IIFM) में आयोजित 'अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2026' के सरकारी कार्यक्रम में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहाँ केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 'प्रोजेक्ट चीता' और 'लोकल एक्शन' की जमकर तारीफ की।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बड़े-बड़े होर्डिंग्स, डिजिटल पोर्टल्स और कागजी रिपोर्ट्स से भारत के उजड़ते जंगलों को बचाया जा सकता है?

DeforestationImpact, DevelopmentVsForests, BiodiversityPolicies

दावों के पीछे का सच !

सरकार इस कार्यक्रम में 'वैश्विक प्रभाव के लिए स्थानीय कार्रवाई' (Acting Locally for Global Impact) का नारा दे रही थी, लेकिन पर्यावरणविदों और जमीनी आंकड़ों पर नजर डालें तो हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

DeforestationImpact, DevelopmentVsForests, BiodiversityPolicies

  • एक हाथ से संरक्षण, दूसरे हाथ से विनाश:सरकार एक तरफ चीता संरक्षण और ग्रासलैंड की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ देश के सबसे घने और संवेदनशील जंगलों को कॉर्पोरेट माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए धड़ल्ले से मंजूरी दी जा रही है। छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ आदिवासियों के भारी विरोध के बावजूद हजारों पेड़ों को काट दिया गया।

  • बायोडायवर्सिटी एक्ट में संशोधन पर सवाल: सरकार ने हाल ही में बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (BD) एक्ट में जो संशोधन किए हैं, उन्हें 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (Ease of Doing Business) यानी उद्योगों की सहूलियत के नाम पर प्रमोट किया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इन संशोधनों ने कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए जंगलों और जैविक संसाधनों का दोहन करना और आसान बना दिया है, जिससे स्थानीय समुदायों के अधिकार कमजोर हुए हैं।

क्या सिर्फ 'प्रोजेक्ट चीता' की ब्रांडिंग से बचेगा पर्यावरण ?

समारोह में मध्य प्रदेश को 'टाइगर स्टेट' बताने और चीतों के सफल पुनर्वास की खूब कहानियां सुनाई गईं। लेकिन केवल एक या दो हाई-प्रोफाइल प्रजातियों की ब्रांडिंग करके सरकार अपनी उन नीतियों को नहीं छुपा सकती, जो पूरे के पूरे इकोसिस्टम को नष्ट कर रही हैं। क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए पुराने, घने और प्राकृतिक जंगलों की जरूरत होती है, न कि केवल कागजी वृक्षारोपण (Aforestation) की, जिसकी आड़ में असली जंगलों की कटाई को सही ठहराया जाता है।


वहीँ सतपुड़ा बायोडायवर्सिटी कांसेर्वेसन सोसायटी का कहना है की :“सरकार एक तरफ जैव विविधता संरक्षण के बड़े-बड़े दावे और उत्सव करती है, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर देश के महत्वपूर्ण जंगलों को बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए खत्म किया जा रहा है। सिंगरौली क्षेत्र में Adani Group से जुड़े परियोजनाओं के लिए लगभग 5-6 लाख पेड़ों की कटाई और Ken-Betwa Link Project के तहत पन्ना के संवेदनशील वन क्षेत्रों में हज़ारों पेड़ों को काटे जाने की तैयारी इस दोहरे रवैये का सबसे बड़ा उदाहरण है। केवल ‘प्रोजेक्ट चीता’ जैसी ब्रांडिंग से पर्यावरण नहीं बचेगा, जब तक प्राकृतिक और पुराने जंगलों को विनाशकारी परियोजनाओं से सुरक्षित नहीं किया जाता।”

अधिक जानकारी और साक्ष्यों के लिए देखें:

देश में जंगलों की स्थिति, पर्यावरण नियमों में ढील और हसदेव अरण्य जैसे संवेदनशील मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट्स और साक्ष्य आप इन लिंक्स पर देख सकते हैं:

  • देश में जंगलों की कटाई, पर्यावरण कानूनों में बदलाव और पर्यावरणविदों के विश्लेषण के लिए: Down To Earth या The Hindu Environmental News

Top Stories

1/14
bottom of page