शाहपुर: स्वच्छता के नाम पर लाखों की बंदरबांट, बदहाली के आंसू रो रही माचना नदी और शहर की गलियां CleanlinessDrive, EnvironmentalNeglect, MunicipalAccountability
- Mar 22
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शाहपुर। स्वच्छ भारत अभियान के दावों के बीच शाहपुर नगर परिषद की पोल खुलती नजर आ रही है। प्रतिवर्ष साफ-सफाई के मद में लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद शहर गंदगी के अंबार पर बैठा है। जमीनी हकीकत यह है कि परिषद के पास पर्याप्त संसाधन और सफाईकर्मियों की फौज होने के बाद भी शहर का एक भी वार्ड कचरा मुक्त नहीं हो सका है।

लाखों का बजट, फिर भी बदहाल व्यवस्था
नगर परिषद के 15 वार्डों में तैनात सफाईकर्मियों के वेतन, कचरा वाहनों के डीजल और मशीनरी पर जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च किया जा रहा है। इसके बावजूद सफाई व्यवस्था केवल 'कागजी घोड़ों' तक सीमित है। विडंबना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी केवल विशेष अवसरों पर झाड़ू थामकर फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रह गए हैं। नियमित निगरानी के अभाव में सफाईकर्मी और सुपरवाइजर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं।

माचना नदी: जीवनदायिनी से 'गंदगी का अड्डा' बनने तक का सफर
शहर की पहचान मानी जाने वाली माचना नदी आज नगर परिषद की अनदेखी का शिकार है। विचलित करने वाली बात यह है कि नदी के घाट कचरे से पटे पड़े हैं और पानी इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि लोग वहां आचमन करना तो दूर, हाथ धोने से भी कतरा रहे हैं। जल संरक्षण के दावों के बीच नदी में गिरता कचरा और मलमूत्र परिषद की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
CMO और जनप्रतिनिधियों की जुगलबंदी पर सवाल
शहर में चर्चा है कि नगर परिषद के निर्वाचित पार्षदों की बात न तो नगर के प्रथम नागरिक सुन रहे हैं और न ही मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO)। सूत्रों के मुताबिक, परिषद में जनहित के कार्यों से ज्यादा भ्रष्टाचार की सेवा को प्राथमिकता दी जा रही है। यही कारण है कि शिकायतों के बाद भी शहर की स्थिति जस की तस बनी हुई है।

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CMO का 'टेंडर' वाला पुराना राग
जब इस बदहाली को लेकर शाहपुर CMO से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने आश्वासन का पिटारा खोल दिया। उनका कहना है कि "जल संवर्धन अभियान के तहत सफाई कराई जाएगी और वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (WTP) के लिए जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू होगी।"
तीखा सवाल: सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन केवल टेंडर और अभियानों के नाम पर समय काटना चाहता है? जब तक ये कागजी टेंडर धरातल पर उतरेंगे, तब तक माचना नदी और शहर की स्वच्छता का क्या होगा? क्या लाखों का बजट सिर्फ टेंडर और वेतन बांटने के लिए है, या जनता को साफ वातावरण देने के लिए?

निष्कर्ष
जनता में बढ़ता आक्रोश इस बात का संकेत है कि अब केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। यदि समय रहते परिषद ने सफाई की ठोस रणनीति नहीं बनाई और नदी के संरक्षण के लिए जमीनी कदम नहीं उठाए, तो शाहपुर की जनता बड़े आंदोलन के लिए मजबूर होगी।
संपादकीय टिप्पणी: प्रशासन को यह समझना होगा कि स्वच्छता केवल फोटो खिंचवाने का माध्यम नहीं, बल्कि नागरिकों का मौलिक अधिकार है।











