विशेष रिपोर्ट: बैतूल में व्यवस्था की बेरुखी और भूख की लड़ाई—क्या रसोइया महिलाओं का आत्मसम्मान मात्र 5000 रुपये का मोहताज है?AdministrativeNeglect WomenInWorkforce GovernmentAccountability
- Jan 8
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बैतूल। सरकारी दफ्तरों की ऊंची चौखटों और ठंडे कमरों में बैठे अधिकारियों के एक 'कागजी आदेश' ने उन गरीब परिवारों के चूल्हे ठंडे कर दिए हैं, जो वर्षों से छात्रावासों में बच्चों का पेट पाल रहे थे। जनजाति कार्य विभाग कार्यालय में पिछले दिनों हुई आत्मदाह की कोशिश महज एक हादसा नहीं, बल्कि उस मानसिक प्रताड़ना का नतीजा है, जिससे जिले की करीब 20 रसोइया महिलाएं पिछले दो महीनों से जूझ रही हैं।
व्यवस्था की मार: दो महीने से खाली हाथ, अब उम्मीद भी टूट रही
6 जनवरी को जब इन महिलाओं से जमीनी चर्चा की गई, तो जो दर्द सामने आया वह प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा प्रहार करता है। महिलाओं का कहना है कि वे वर्षों से अपनी सेवाएं दे रही थीं, लेकिन अचानक 'पद रिक्त नहीं है' जैसे तकनीकी तर्क देकर उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया गया।
एक महिला कर्मचारी ने रुंधे गले से बताया— “आज के महंगाई के दौर में हम 5,000 रुपये के अल्प वेतन पर भी मेहनत करने को तैयार हैं, क्योंकि हमारे पास इसके अलावा कोई सहारा नहीं है। लेकिन दो महीने से हम बेरोजगार हैं, घर चलाना दूभर हो गया है।”
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आश्वासनों का सिलसिला और प्रशासनिक चुप्पी
महिलाओं ने अपनी बहाली के लिए कलेक्टर से लेकर क्षेत्र से केंद्रीय राज्य मंत्री ट्रायबल मिनिस्ट्री डीडी उइके तक का दरवाजा खटखटाया। हर जगह से केवल आश्वासन ही मिले। ताजा स्थिति यह है कि कलेक्टर ने एक सूची तैयार करवाकर 8-10 दिनों का समय मांगा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जो महिलाएं पहले ही दो महीने की बेरोजगारी और वित्तीय तंगी झेल चुकी हैं, क्या वे अब एक और आश्वासन के भरोसे बैठ सकती हैं?
असिस्टेंट कमिश्नर के कक्ष में क्यों उठाना पड़ा आत्मघाती कदम?
जब शिकायतों और आवेदनों पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो मानसिक तनाव इस कदर बढ़ गया कि एक महिला ने सहायक आयुक्त के सामने ही खुद पर पेट्रोल छिड़क लिया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि जब गरीब की सुनवाई बंद हो जाती है, तो वह किस तरह हताशा के चरम पर पहुंच जाता है। प्रशासन इसे नियम की दुहाई दे रहा है, लेकिन नियम मानवीय संवेदनाओं से ऊपर नहीं हो सकते।
प्रशासनिक संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल:
न्याय की उम्मीद कहां: क्या सालों तक सरकारी संस्थानों में पसीना बहाने वाले इन मजदूरों के लिए कोई सुरक्षा कवच नहीं है?
अधिकारों का हनन: क्या शासन के आदेश केवल गरीबों की छंटनी के लिए होते हैं? क्या उन्हें हटाने से पहले उनके पुनर्वास या रोजगार के बारे में सोचना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं थी?
आर्थिक चोट: क्या जिम्मेदार अधिकारी इस बात का अहसास रखते हैं कि 5,000 रुपये की मामूली आय छीनने से एक परिवार किस कदर बिखर सकता है?
OPINION- बैतूल की ये महिलाएं आज केवल नौकरी नहीं, बल्कि अपने जीने का अधिकार मांग रही हैं। प्रशासन ने 10 दिनों का जो समय दिया है, वह उनकी आखिरी उम्मीद है। यदि इस बार भी वादा पूरा नहीं हुआ, तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी पूरी तरह जिले के जिम्मेदार अधिकारियों की ही होनी चाहिए।











