बैतूल: भार्गव समाज ने धूमधाम से मनाई भगवान परशुराम जयंती; शनि मंदिर में श्रद्धा और परंपरा का अद्भुत संगम
बैतूल। अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम जयंती के पावन अवसर पर बैतूल के गंज क्षेत्र में आध्यात्मिक उत्साह का माहौल देखा गया। नगर के प्रतिष्ठित शिव शक्ति हनुमान शनि देव मंदिर में भार्गव समाज द्वारा आयोजित जन्मोत्सव कार्यक्रम में न केवल धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए, बल्कि समाज की गौरवशाली वंशावली और सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित किया गया।
मंदिर समिति के अध्यक्ष और समाज के वरिष्ठ सदस्य विवेक (छुट्टू) भार्गव के नेतृत्व में आयोजित इस दो दिवसीय उत्सव ने स्थानीय श्रद्धालुओं को भक्ति के सूत्र में पिरोया।

उत्सव का क्रम: आस्था और समर्पण
जन्मोत्सव की तैयारियाँ शनिवार रात्रि से ही प्रारंभ हो गई थीं। आयोजन के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित रहे:
आकर्षक साज-सज्जा: जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में शनि मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया था, जो आकर्षण का केंद्र बना रहा।
भंडारा और भोग: शनिवार रात्रि को भगवान परशुराम को विशेष भोग अर्पित किया गया, जिसके पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन हुआ।
मुख्य अनुष्ठान: रविवार प्रातः 9 बजे भार्गव समाज के महिला और पुरुष सदस्यों की उपस्थिति में भगवान का विधि-विधान से अभिषेक और पूजन किया गया।
महाआरती: अनुष्ठान का समापन भव्य महाआरती और प्रसादी वितरण के साथ हुआ।
'भार्गव' शब्द का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व
कार्यक्रम के दौरान भार्गव सभा बैतूल के अध्यक्ष दीपक भार्गव ने समाज की उत्पत्ति और भगवान परशुराम से उनके संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का एक माध्यम है।
दीपक भार्गव के अनुसार: "हम स्वयं को भगवान परशुराम के वंशज मानते हैं। भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ था। महर्षि जमदग्नि स्वयं महर्षि भृगु के वंशज थे। भृगु ऋषि के वंश में जन्म लेने के कारण ही परशुराम जी को 'भार्गव' कहा गया, जिसका अर्थ है 'भृगु का वंश'। हमारा समाज अपनी उत्पत्ति इन्ही महान ऋषियों से जोड़ता है, इसलिए हमें भार्गव ब्राह्मण भी कहा जाता है।"












