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समान नागरिक संहिता और 2029 का राजनीतिक चक्रव्यूह: क्या है बीजेपी की 24x7 चुनावी रणनीति की पूरी इनसाइड स्टोरी?The Uniform Civil Code, the 2029 Political Labyrinth, the BJP's 24x7 electoral strategy,

5 days ago
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एडिटोरियल :भारतीय राजनीति में चुनावों का चक्र कभी थमता नहीं है। अमूमन राजनीतिक दल चुनाव जीतने के बाद पांच साल सरकार चलाते हैं और फिर अगले चुनावी चक्र की तैयारी करते हैं, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय फलक पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस पूरे समीकरण से अलग हटकर काम करती रही है। राजनीतिक विश्लेषक इसी कार्यशैली को 'बीजेपी की 24x7 चुनावी राजनीति' की संज्ञा देते हैं। हाल ही में संपन्न आम चुनावों के बाद, जहाँ राज्यों के चुनावी दंगल सामने हैं, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछानी शुरू कर दी है। 13 सितंबर को एक प्रेस वार्ता में उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि 2029 से पहले देश के सभी एनडीए शासित राज्यों में 'समान नागरिक संहिता' यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद से देश का राजनीतिक पारा एक बार फिर चढ़ गया है।

इस पूरी रणनीति के पीछे की टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष के कड़े नैरेटिव ने बीजेपी के बड़े बहुमत के सपने को झटका दिया था, जिसके बाद पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। केंद्र सरकार संसद से सीधे राष्ट्रव्यापी कानून पास कराने के बजाय उत्तराखंड और असम जैसे राज्यों के मॉडलों के जरिए इसे आगे बढ़ा रही है। इस रणनीति के दो बड़े राजनीतिक लाभ हैं—पहला, राज्यों के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रवाद और समान अधिकारों का एजेंडा लगातार गर्म रहेगा, और दूसरा, विपक्ष को हर राज्य में अलग-अलग मुद्दों पर उलझने का मौका मिलेगा। यह एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव है जो सरकार विरोधी रुझान और विकास के दावों से जुड़े सवालों को एक झटके में ढकने की क्षमता रखता है।

The Uniform Civil Code, the 2029 Political Labyrinth, the BJP's 24x7 electoral strategy,

मुस्लिम पर्सनल लॉ, शरीयत और लैंगिक न्याय !

समान नागरिक संहिता का सबसे सीधा और व्यापक असर मुस्लिम समाज के पर्सनल लॉ यानी शरीयत पर पड़ने की संभावना है। मौजूदा व्यवस्था के तहत देश के मुस्लिम समुदाय में शादी, तलाक, बहुविवाह, संपत्ति का अधिकार और उत्तराधिकार जैसे मामले उनके व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत तय होते हैं। यूसीसी लागू होने के बाद ये सभी धार्मिक और व्यक्तिगत कानून समाप्त हो जाएंगे और देश के हर नागरिक पर एक समान कानून लागू होगा। सरकार इस पूरे कदम को 'लैंगिक न्याय' और 'समानता' के रूप में पेश कर रही है, जिसके तहत तीन तलाक की तर्ज पर निकाह हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं को खत्म कर महिलाओं को समान अधिकार देने की वकालत की जा रही है। इसके विपरीत, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विपक्षी दलों का यह मानना है कि यूसीसी के बहाने संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 के तहत अल्पसंख्यकों को मिली धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हमला किया जा रहा है।


इस पूरी बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर देश का प्रबुद्ध वर्ग और आम नागरिक विचार कर रहा है। जब 'एक देश, एक कानून' की बात की जाती है, तो समाज का एक वर्ग यह मांग भी उठाता है कि देश के अन्य विशेष और कड़े कानूनों की भी गहन समीक्षा होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, एससी-एसटी एक्ट जैसे कानूनों के दुरुपयोग की जब खबरें सामने आती हैं, तो अदालतों और समाज में यह चिंता जताई जाती है कि किसी भी निर्दोष नागरिक का कानूनी उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। यहीं पर बीजेपी की कोर रणनीति काम करती है; एक तरफ वह यूसीसी के जरिए बहुसंख्यक समाज की 'समान कानून' की मांग को पूरा कर रही है, तो दूसरी तरफ मध्यम वर्ग और सामान्य जातियों को यह संदेश दे रही है कि वह हर स्तर पर न्याय और समानता के सिद्धांत को लागू करने के प्रति गंभीर है।

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संविधान निर्माता डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 26 जनवरी 1964 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में कहा था कि एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण केवल कड़े कानूनों से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि देश का कानून अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितनी सुरक्षा और सम्मान देता है। आज जब 2029 की लड़ाई की रूपरेखा तैयार हो रही है, तो एक तरफ बीजेपी का राष्ट्रवाद, चौबीसों घंटे का चुनावी प्रबंधन और यूसीसी का बड़ा दांव है, तो दूसरी तरफ विपक्ष का धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय को बचाने का चक्रव्यूह है। देश का आम नागरिक अब केवल सियासी नारों के बजाय अपने अधिकारों और न्याय की जमीनी हकीकत पर आधारित फैसलों की उम्मीद कर रहा है। इस पूरी राजनीतिक बिसात पर आपकी अपनी क्या राय है?

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