सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले पेंडिंग अपीलों पर तत्काल सुनवाई से किया इनकार, कहा "ये केवल उपचुनाव हैं"Supreme Court refuses, immediate hearing on pending appeals, ahead of West Bengal
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने पश्चिम बंगाल के रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा उपचुनावों से ठीक पहले, पेंडिंग अपीलों पर जल्द सुनवाई की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि ये केवल उपचुनाव हैं और इससे अधिक कुछ नहीं।

यह महत्वपूर्ण निर्णय उस पीठ द्वारा लिया गया जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। इन तीनों न्यायाधीशों की बेंच ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद से लंबित लाखों अपीलों से जुड़े इस मामले की सुनवाई की तारीख को आगे बढ़ाने या उसमें किसी भी प्रकार की तेजी लाने से साफ मना कर दिया।
अदालत में मामले की पैरवी कर रहे वकील ने तत्काल सुनवाई का अनुरोध करते हुए दलील दी थी कि राज्य में 18,000 से अधिक अपीलें अभी भी लंबित पड़ी हुई हैं और इन अपीलों से जुड़े लोगों को पहले हुए चुनावों में भी अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर नहीं मिल पाया था। वकील ने अनुरोध किया था कि मामले की निर्धारित तारीख से पहले सुनवाई की जाए ताकि इन मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा हो सके। हालांकि, अदालत ने इस आग्रह को स्वीकार नहीं किया और मामले को अपनी तय तिथि पर ही सूचीबद्ध रहने दिया, जिससे इन निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं को एक बार फिर मतदान प्रक्रिया से बाहर रहना पड़ सकता है।
Supreme Court refuses, immediate hearing on pending appeals, ahead of West Bengal
न्यायालय की इस कार्यवाही के दौरान पिछली सुनवाइयों और न्यायमूर्तियों द्वारा दिए गए पुराने बयानों का भी संदर्भ आया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पिछली टिप्पणियों की चर्चा की गई, जिसमें उन्होंने पहले कहा था कि भले ही इस चुनाव में कुछ लोग मतदान न कर सकें, लेकिन मतदाता सूचियों में बने रहने का उनका अधिक मूल्यवान अधिकार सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि यदि एक निश्चित प्रतिशत मतदाता मतदान प्रक्रिया से बाहर रह जाते हैं और हार-जीत का अंतर कम होता है, तो ऐसी स्थिति में अदालतों को बहुत ही सावधानी से विचार करना पड़ता है, हालांकि अदालत ने इस मामले में तुरंत कोई व्यापक आदेश पारित करने से परहेज किया।
इस बीच, मीडिया रिपोर्ट्स और आरटीआई के माध्यम से सामने आए आंकड़ों ने इस पूरी प्रक्रिया पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। द वायर की रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत के आदेश पर गठित विभिन्न ट्रिब्यूनलों में कुल 38 लाख से अधिक अपीलें अभी भी लंबित अवस्था में पड़ी हैं। इसके अलावा, कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी के एक आरटीआई आवेदन के जवाब में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जो आंकड़े दिए गए थे, वे बेहद चौंकाने वाले थे। उन आंकड़ों के मुताबिक, जिन अपीलों पर अब तक फैसले सुनाए गए हैं, उनमें से लगभग 91.13 प्रतिशत मामलों में मतदाताओं के नाम वापस वैध रूप से मतदाता सूची में जोड़े गए। इससे यह स्पष्ट संभावना बनती है कि यदि बाकी पेंडिंग अपीलों पर भी निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए, तो बड़ी संख्या में छूटे हुए मतदाताओं को उनका अधिकार वापस मिल सकता है।
इसके अतिरिक्त, पश्चिम बंगाल की इस विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर कई तरह की प्रशासनिक और राजनीतिक चिंताएं भी सामने आई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात भी उजागर हुई है कि किस प्रकार लक्षित बहिष्करण के जरिए विशेष समुदायों और विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं को प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में प्रभावित किया गया है। इन तमाम विवादों और कानूनी पचड़ों के बीच सुप्रीम कोर्ट के इस ताज़ा फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि अदालत फिलहाल केवल उपचुनावों के मद्देनजर सामान्य न्यायिक कैलेंडर में कोई विशेष बदलाव करने के पक्ष में नहीं है, जिससे प्रभावित मतदाताओं की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।











