राजनीति का अंडरकरंट: राजस्थान निकाय चुनाव में निर्दलीयों की आंधी और करणी सेना का प्रभाव!
राजनीति में असली ताकत बड़े-बड़े महलों या पार्टियों के दफ्तरों में नहीं बैठती, वह तो पोलिंग बूथ की लाइन में खड़े उस आम नागरिक के पास होती है, जो वक्त आने पर बड़े से बड़े किले को एक झटके में ढहा देता है। यह वक्तव्य था भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन का।
राजस्थान की सियासत में पारा हमेशा 45 डिग्री के पार रहता है, और हाल ही में आए 14 सितंबर के 309 नगरीय निकायों के चुनाव नतीजों ने इसे फिर साबित कर दिया है। ऊपरी तौर पर देखने वालों के लिए यह हेडलाइन बड़ी सीधी है कि बीजेपी ने 4,179 वार्डों पर परचम लहराया और कांग्रेस 3,613 वार्डों के साथ दूसरे नंबर पर रही। लेकिन, राजनीति की असली खूबसूरती उसके अंडरकरंट में होती है। इस चुनाव की सबसे बड़ी हेडलाइन वह नहीं है जो बीजेपी की जीत दिखा रही है, बल्कि वह है जो 2,273 वार्डों में निर्दलीयों की प्रचंड जीत के रूप में दर्ज हुई है। यह कहानी है उसी अंडरकरंट की, जिसके पीछे राजपूत करणी सेना और उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना का नाम उभर कर आ रहा है।

नतीजों के ठीक बाद महिपाल सिंह मकराना ने एक बड़ा दावा ठोकते हुए कहा कि पूरे राजस्थान में जो 2,200 से ज्यादा निर्दलीय पार्षद जीतकर आए हैं, उनमें से लगभग 70 प्रतिशत उम्मीदवारों को करणी सेना और उनके 'स्वर्ण न्याय मंच' का खुला समर्थन हासिल था। इसके पीछे की क्रोनोलॉजी को समझें तो UGC नियमों को लेकर सवर्ण समाजों में लंबे समय से उबाल था। करणी सेना ने इसके विरोध में राजस्थान में 800 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकाली थी। जयपुर की एक रैली के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में मकराना खुद लहूलुहान हुए, जिसके बाद यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं रहा। करणी सेना ने एक व्यावहारिक रणनीति के तहत प्रत्याशियों से लिखित में शपथ पत्र लिया कि वे UGC नियमों के खिलाफ उनका साथ देंगे, और बदले में उन्हें जमीनी समर्थन मिला।
Political Undercurrent, The Independent Wave, Karni Senas Influence in Rajasthan Civic Polls
इस दावे के समर्थन में कुछ ठोस आंकड़े भी सामने आते हैं। खुद महिपाल सिंह मकराना के गढ़ मकराना नगर परिषद में कुल 60 वार्ड हैं, जहां सत्ता में बैठी भाजपा सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस 18 पर अटक गई, जबकि निर्दलीयों ने 36 वार्ड जीतकर दोनों बड़ी पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में भी बीजेपी सिर्फ 20 वार्ड जीत पाई और निर्दलीयों ने 36 वार्डों पर कब्जा कर लिया। वहीं, केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के दबदबे वाले बीकानेर में भी बीजेपी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी और कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। करणी सेना का साफ कहना है कि उनका कोर वोट बैंक खिसकने की वजह से ही बीजेपी के पारंपरिक किले ढहे हैं।
हालांकि, इस पूरे नैरेटिव का दूसरा पहलू भी है। बीजेपी के प्रवक्ता लक्ष्मीकांत भारद्वाज का तर्क है कि स्थानीय निकाय चुनाव हमेशा नाली, सड़क, बिजली और व्यक्तिगत संबंधों जैसे स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं। इन चुनावों में पारंपरिक रूप से हमेशा से 20 से 25 फीसदी निर्दलीय प्रत्याशी जीतते ही रहे हैं, इसलिए इसे किसी एक सामाजिक संगठन या आंदोलन की लहर मान लेना पूरी तरह सही नहीं होगा।
अब बात पार्षदों की जीत से आगे निकल चुकी है और असली खेल 21 सितंबर से शुरू होने वाला है, जब ये पार्षद तय करेंगे कि उनके शहर का मेयर या सभापति कौन बनेगा। जहां स्पष्ट बहुमत नहीं है, वहां निर्दलीयों की पौ-बारह है और 'बाड़ेबंदी' का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। अगर इन निर्दलीयों की डोर वाकई करणी सेना के हाथ में है, तो राजस्थान की कई बड़ी नगरपालिकाओं की चाबी इस बार किसी राजनीतिक दल के पास नहीं, बल्कि करणी सेना के पास होगी।











