वन्यजीव तस्करी पर बड़ा शिकंजा: डीआरआई के छह अभियानों में तेंदुए की खाल और कछुए जब्त, 13 गिरफ्तार; मध्य प्रदेश में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
आदिल खान (भोपाल): राजस्व आसूचना निदेशालय (डीआरआई) ने देश भर में वन्यजीवों की अवैध तस्करी और उनके अंगों के व्यापार पर लगाम कसने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया है। पिछले 10 दिनों के भीतर देश के विभिन्न राज्यों में चलाए गए छह अलग-अलग खुफिया-आधारित अभियानों के दौरान दुर्लभ वन्यजीवों की तस्करी से जुड़े 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में संरक्षित प्रजातियों के अवशेष और जीवित वन्यजीव सुरक्षित बरामद किए गए हैं, जो वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

विभिन्न राज्यों में की गई समन्वित कार्रवाइयां: खुफिया जानकारियों के आधार पर डीआरआई ने ओडिशा, कर्नाटक, मेघालय, मध्य प्रदेश और असम में कई स्थानों पर दबिश दी। ओडिशा के कोरापुट और मध्य प्रदेश के सीधी जिले में हुई दो अलग-अलग कार्रवाइयों में दो तेंदुओं की खाल बरामद की गई, जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत पूरी तरह संरक्षित श्रेणी में आते हैं। इन मामलों में कुल 5 लोगों को हिरासत में लिया गया है।
सीधी वनमंडल द्वारा जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, डीआरआई भोपाल की टीम ने 05.09.2026 को सीधी शहर में दो आरोपियों—अभिषेक सिंह चंदेल और अनमोल सिंह चंदेल को थार वाहन (MP53ZB007) और एक नग तेंदुए की खाल के साथ पकड़ा था। इसके बाद वनमंडल सीधी, रीवा, डीआरआई और एसटीएफ की संयुक्त टीम द्वारा की गई जांच में शिकार करने वाले तीसरे आरोपी ललन सिंह गोड़ को भी गिरफ्तार किया गया, तथा आरोपियों को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर लिया गया।
इसके अलावा, बेंगलुरु के पास चलाए गए एक अन्य अभियान में छह कपड़े के थैलों में छिपाकर रखे गए 180 जीवित भारतीय तारा कछुए बरामद किए गए, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग रहती है। मेघालय के री-भोई और असम के कार्बी आंगलोंग जिलों में हुई छापों की कार्रवाई के दौरान कुल लगभग 24 किलोग्राम सूखे पैंगोलिन के शल्क जब्त किए गए। साथ ही, असम के केओखाली में संदिग्धों के पास से 12 जीवित टोके गेको और कार्बी आंगलोंग में पैंगोलिन के साथ-साथ लगभग 500 ग्राम बाघ की खोपड़ी और दांतों सहित अन्य हड्डियां भी बरामद की गईं।
मध्य प्रदेश में वन विभाग की भूमिका और कार्यप्रणाली पर खड़े हुए बड़े सवाल: इस पूरी कार्रवाई ने विशेष रूप से मध्य प्रदेश में राज्य के वन विभाग की जमीनी कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। मध्य प्रदेश को देश का 'टाइगर स्टेट' कहा जाता है और यहां वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपये का बजट, एक मजबूत वन विभाग और अमला तैनात है। इसके बावजूद, यदि वित्त मंत्रालय के अधीन आने वाली केंद्रीय एजेंसी (डीआरआई) को राज्य के भीतर आकर तेंदुए की खाल की तस्करी जैसे मामलों का भंडाफोड़ करना पड़ रहा है, तो यह स्पष्ट करता है कि स्थानीय स्तर पर वन विभाग की खुफिया और मैदानी चौकसी कितनी कमजोर हो चुकी है।
जब राज्य में वन विभाग और वन्यजीव विंग (स्टेट टाइगर फोर्स) पहले से ही मौजूद हैं, तो ऐसे में तस्करों का सक्रिय रहना और बाहरी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा इन्हें पकड़ना स्थानीय वन अधिकारियों की कार्यशैली और मॉनिटरिंग पर एक बड़ा धब्बा है। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि या तो विभाग पूरी तरह से लापरवाह है या फिर तस्करों और स्थानीय तंत्र के बीच सांठगांठ के चलते संरक्षित जीवों का शिकार धड़ल्ले से जारी है।
मुख्य वन्यजीव वार्डेन का पक्ष इस गंभीर विषय पर चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डेन डॉ. समीता राजोरा से चीफ कॉरेस्पोंडेंट राजकमल गुप्ता ने चर्चा की। चर्चा में उन्होंने बताया कि डीआरआई ने कार्रवाई के पश्चात वन विभाग को सूचित कर तेंदुए की खाल सौंपी, जिस पर वन विभाग द्वारा त्वरित कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि वन विभाग लगातार इस प्रकार की घटनाओं को मॉनिटर कर रहा है और पुख्ता कार्रवाई को अंजाम दे रहा है। इस विषय मे (हेड ऑफ़ फॉरेस्ट फोर्स, एम.पी .) प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख सुभरंजन सेन से भी उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया परंतु प्राप्त जानकारी के अनुसार वे रिजर्व फॉरेस्ट मे होने के कारण संपर्क नहीं हो पाया ।
अवैध उत्खनन और अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन?: दूसरी ओर, मध्यप्रदेश के वन क्षेत्रों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय संधि जैसे रामसर संधि क्षेत्रों में लगातार अवैध उत्खनन से भी हजारों जंगली जीव प्रभावित हो रहे हैं। इसके साथ ही, लाखों की संख्या में जलीय जीवों की हत्या प्रशासनिक अनदेखी और वन विभाग की कार्यप्रणाली को उजागर करती है। अवैध उत्खनन का दायरा अब मानव बस्तियों से बढ़कर जंगलों तक पहुंच गया है, तब भी प्रशासन मौन बना रहा और अब यह अंतरराष्ट्रीय संधियों तथा संरक्षित क्षेत्रों तक जा पहुंचा है। इन सभी गंभीर मामलों के खुलासे और साक्ष्य जांच एजेंसियों के समक्ष प्रस्तुत किए जाना तय है।
इन सभी अभियानों के दौरान पकड़े गए संदिग्धों, जब्त किए गए वाहनों और वन्यजीव सामग्रियों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत संबंधित राज्यों के वन विभागों व रेंज अधिकारियों को सौंप दिया गया है, जहां आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है। इस तरह की बहु-एजेंसी और खुफिया-आधारित कार्रवाइयां वन्यजीवों की अवैध तस्करी के नेटवर्क को प्रभावी ढंग से बाधित करती हैं, जिससे देश की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण को और अधिक मजबूती मिलती है, बशर्ते स्थानीय एजेंसियां भी अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं।











