अग्निपथ योजना पर जनरल नरवणे की आत्मकथा से उठे सवाल: क्या नीतिगत निर्णयों से सैन्य ढांचे पर पड़ा असर? General Naravane, autobiography regarding, the Agnipath scheme
Editorial Opinion:पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' के सामने आए अंशों ने देश के रणनीतिक और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। समाचार एजेंसी पीटीआई और मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से सामने आई जानकारियों के अनुसार, सशस्त्र बलों में अल्पकालिक भर्ती के लिए लाई गई 'अग्निपथ योजना' का मूल स्वरूप सेना के शुरुआती प्रस्ताव से काफी भिन्न था। इन खुलासों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों की निर्णय-प्रक्रिया, नौकरशाही की भूमिका और तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2020 की शुरुआत में सेना ने 'टूर ऑफ ड्यूटी' नाम से एक सीमित और प्रायोगिक मॉडल का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य सेना के पारंपरिक रेजिमेंटल ढांचे को प्रभावित किए बिना युवाओं को एक छोटा अवसर देना था।
हालांकि, जब यह नीति अंतिम रूप में 'अग्निपथ' बनकर सामने आई, तो इसका दायरा अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया गया था। संस्मरण के अंशों के अनुसार, यह फैसला नौसेना और वायुसेना के लिए पूरी तरह चौंकाने वाला था, क्योंकि तकनीकी विशेषज्ञता वाले कैडरों को इस तरह के अल्पकालिक चक्र के लिए तैयार नहीं माना गया था। रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि दशकों पुरानी सैन्य व्यवस्था में इतने बड़े बदलाव से पहले व्यापक संस्थागत विचार-विमर्श की आवश्यकता थी।
रक्षा विश्लेषकों ने अग्निपथ मॉडल के क्रियान्वयन के बाद से कई व्यावहारिक चिंताओं को रेखांकित किया है:
प्रशिक्षण की सीमित अवधि: पारंपरिक सैनिकों के मुकाबले अग्निवीरों का प्रशिक्षण घटाकर लगभग छह महीने कर दिया गया है, जिससे आधुनिक और तकनीकी हथियारों के त्वरित संचालन पर असर पड़ने की आशंका जताई गई।
रेजिमेंटल निरंतरता: सेना की प्राथमिक ताकत उसकी पारंपरिक रेजिमेंटल पहचान और दीर्घकालिक सामंजस्य में रही है। केवल चार साल की सेवा और 25% रिटेंशन की सीमा से इस निरंतरता पर प्रभाव पड़ने की बात कही गई।
भविष्य की सुरक्षा: 75% सैनिकों को बिना पेंशन, ग्रेच्युटी या पूर्व-सैनिक स्वास्थ्य योजनाओं (ECHS) के सेवामुक्त करने से युवाओं में स्थायी सैन्य करियर के प्रति आकर्षण कम होने का तर्क दिया गया।
इन्हीं जमीनी चुनौतियों के चलते अब सैन्य स्तर पर इस योजना की आंतरिक समीक्षा और रिटेंशन दर को 25% से बढ़ाने पर विचार किए जाने की चर्चाएं हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू वित्तीय प्राथमिकताओं से जुड़ा है। सरकार की ओर से इस योजना का मुख्य आधार बढ़ते पेंशन बिल को नियंत्रित करना और उस पूंजी को हथियारों के आधुनिकीकरण में लगाना बताया गया था।
इसके विपरीत, विश्लेषकों का एक वर्ग सवाल उठाता है कि जहां विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा लोकलुभावन और मुफ्त योजनाओं पर भारी बजटीय आवंटन किया जाता है, वहीं सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों की सामाजिक सुरक्षा में कटौती करना प्राथमिकताओं के असंतुलन को दर्शाता है। इसके साथ ही, तीनों सेनाओं के एकीकरण के लिए प्रस्तावित थियेटर कमानों (Theatre Commands) की स्थापना में प्रशासनिक लेटलतीफी ने भी सुधारों की गति को प्रभावित किया है।
इस पूरे विवाद के बीच जनरल नरवणे और प्रकाशक पेंग्विन ने स्पष्ट किया है कि पुस्तक का कोई भी आधिकारिक संस्करण वर्तमान में बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। सार्वजनिक पटल पर चल रही बहस केवल मीडिया में लीक हुए अंशों और समीक्षाओं पर आधारित है। बहरहाल, इन अंशों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक नीतिगत फैसलों में सैन्य नेतृत्व की सीधी सलाह और संस्थागत सहमति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।











