त्योहार के उल्लास पर प्रशासनिक संवेदनहीनता का बुलडोजर: क्या आदिवासी अंचल के गरीबों की आजीविका का कोई मोल नहीं? Administrative insensitivity, bulldozes festive, cheer
लेख :धर्मेंद्र भलावी ।
मध्य प्रदेश का बैतूल जिला अपनी शांतिप्रिय आदिवासी परंपरा, सादगी और मेहनतकश जीवनशैली के लिए पहचाना जाता है। इस अंचल की आत्मा यहां के ग्रामीण, आदिवासी और छोटे तबके के स्वाभिमान में बसती है। स्थानीय स्वशासन और प्रशासनिक व्यवस्था का बुनियादी धर्म जनता के जीवन को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाना होता है। लेकिन चिचोली में नगर परिषद प्रशासन और सीएमओ द्वारा रक्षाबंधन के पावन पर्व के मौके पर जो कदम उठाया गया, उसने व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गहरा आघात किया है।

रक्षाबंधन केवल धागों का त्योहार नहीं, बल्कि परस्पर रक्षा, विश्वास और खुशियों का उत्सव है। साल भर अभावों से जूझने वाला छोटा व्यापारी, रेहड़ी-पटरी वाला और फुटपाथ पर दुकान सजाने वाला गरीब परिवार इस उम्मीद में रहता है कि त्योहार के दो दिनों में कुछ अतिरिक्त कमाई होगी, जिससे वे अपने बच्चों के चेहरे पर मुस्कान ला सकेंगे और अपनी बहनों के हाथ में खुशियां रख सकेंगे। लेकिन चिचोली नगर परिषद ने इस नाजुक वक्त पर इन गरीब परिवारों की दुकानों पर बुलडोजर चला दिया। बिना किसी पूर्व सूचना, बिना संवाद और बिना किसी वैकल्पिक पुनर्वास योजना के उठाया गया यह कदम सीधे तौर पर एक मानवीय त्रासदी है।
क्या यह व्यवस्था का यह दोहरा नजरिया नहीं?: एक जनसेवक और स्थानीय नागरिक के नाते मेरे मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कानून और नियमों का सारा दबाव हमेशा कमजोर, लाचार और सड़क किनारे पेट पालने वाले व्यक्ति पर ही क्यों पड़ता है?
नगर के मुख्य हिस्सों में जो बड़े और पक्के अतिक्रमण बरसों से जमे हुए हैं, उन पर प्रशासन की नजर क्यों नहीं जाती?
क्या प्रशासनिक कार्रवाई की सारी तेजी सिर्फ उन छोटे दुकानदारों पर दिखाने के लिए है जो दैनिक मजदूरी की तरह अपनी दुकान से परिवार का चूल्हा जलाते हैं?Administrative insensitivity, bulldozes festive, cheer
क्या नियम केवल कमजोर वर्ग को उजाड़ने के लिए हैं और रसूखदारों के सामने आते ही कानून की सीमाएं बदल जाती हैं?
बैतूल जिले की जनता यह दोहरा रवैया देख रही है। अतिक्रमण हटाना यदि व्यवस्था सुधारने का हिस्सा है, तो उसकी एक पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए। सबसे पहले छोटे व्यापारियों को चेतावनी दी जानी चाहिए थी, उनके साथ बैठकर संवाद होना चाहिए था और उनके लिए किसी 'हॉकर्स जोन' या वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिए थी। त्योहार के ऐन दिन किसी के रोजगार को मिट्टी में मिला देना सुधार नहीं, बल्कि खुली संवेदनहीनता है।
क्या इस देश मे गरिमा के साथ आजीविका हर नागरिक का बुनियादी हक नहीं ? मध्य प्रदेश के इस आदिवासी क्षेत्र में जनता मेहनत और ईमानदारी से रोटी कमाना जानती है। किसी पर निर्भर रहने के बजाय सड़क किनारे पसीना बहाकर अपने बच्चों का भविष्य संवारने वाले इन छोटे व्यापारियों का स्वाभिमान किसी से कम नहीं है। उनकी रोजी-रोटी छीनकर त्योहार के दिन उनके आशियानों में अंधेरा कर देना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
मैं स्थानीय प्रशासन, नगर परिषद और जिला प्रशासन से आग्रह करता हूं कि वे इस मामले में तुरंत मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं। जिन गरीब दुकानदारों का सामान और रोजगार नष्ट हुआ है, उनका सही आकलन कर उन्हें त्वरित राहत और क्षतिपूर्ति दी जाए। साथ ही नगर में छोटे व्यापारियों के लिए स्थायी व व्यवस्थित वेंडिंग जोन चिन्हित किए जाएं, ताकि वे बिना किसी भय और अपमान के अपनी आजीविका चला सकें।
यदि प्रशासनिक स्तर पर संवाद और समाधान की जगह केवल दमनकारी नीतियां ही अपनाई जाएंगी, तो हमें नगर के हर आम नागरिक और पीड़ित परिवार के सम्मान व बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज बुलंद करनी होगी। विकास वही सार्थक है, जो कमजोर को साथ लेकर चले, न कि उसे कुचलकर आगे बढ़े।











